Monday, 6 January 2020

राजिम इतिहास

राजिम ल पुराना जमाना म कमल भुंइया के नाव ले जानत रीहिन। ओला पदमपुर घलो काहय। बाद म संगम घलो कीहिन। पुराना ग्रंथ पदमपुरान के अनुसार देवपुर भी कीहिन। महाभारत महान पोथी म घलो ''चित्रोत्पलेति कथेति सर्व रूप प्रणाशिणी इति भीष्म पर्वे'' कहे गेहे। लेकिन आज तक ले ये तय नइ हो पाइस कि ये कमल क्षेत्र, पदमपुर, देवपुर अथवा चित्रोत्पल्ला गंगा छेत्र के परसिद्ध नाव राजिम कइसे होइस?''

राजिम छत्तीसगढ़ के पबरित एतिहासिक अऊ सांस्कृतिक केन्द्र आय। अपन पुराना इतिहास, अउ गौरव मय परंपरा ल जोड़े ये नगर ह भगवान बिष्णु के नगर आय। ये जगह ह, छत्तीसगढ़ राज के लाखों लाख भाई-बहिनी मन ल माघी पुन्नी से शिवरात्रि तक एकता के पबरित बंधना म बांधे रहिथे। इहां एक महिना तक बड़े भारी परब भरथे। अपन आप म उत्तर अऊ दच्छिन के संस्कृति ल जोड़ के राजिम संगम के पुन्न ल बांटथे, अउ आज भी जम्मो छत्तीसगढ़िया कहां जाबो बड़ दूर हे गंगा कहिके अपन सब्बो पबरित, धार्मिक काम-काज इही तिरबेनी संगम (महानदी, सेंढूर अउ पइरी नदी) म पूरा करथे। राजिम के अइसन संसकीरती अऊ इतिहास पायके पीछू म एक महान नारी के सेवा, समरपन, मेहनत अऊ साधना के फल जुड़े हे। ओला आज भुला दे गे है। जेन ह बिन सुवारथ के अपन सब कुछ निछावर कर दीस ओहा अपन देवता के श्रीचरण में अपन परान तियाग दीस। आज उही भगवान के आगू वो सती के समाधि हावे। छत्तीसगढ़ राज के चित्रोत्पल्ला गंगा मइया महानदी के गोदी म जनम लेवइया माता राजिम ह तेलीबंस के पुरखा आय। आवव आज पुन्न अस्नान के लाभ लेवन।

सबसे पहिली ये इतिहास के आधार ल देखन। जेमे लेख ग्रंथ, सिलालेख, धातुलेख अउ जेन पुराना अवशेष जुन्ना परमान ले बताए जा सकत हे। राजिम के ये भुइया ह पुराना जमाना म कमल भुइया के नाव ले जानत रीहिन। ओला पदमपुर घलो काहयं। बाद म संगम घलो कीहिन। पुराना ग्रंथ पदमपुरान के अनुसार देवपुर भी कीहिन। महाभारत महान पोथी म घलो चित्रोत्पलेति कथेति सर्व रूप प्रणाशिणी इति भीष्मपर्वे कहे गेहे। लेकिन आज तक ले ये तय नई हो पाइस कि ये कमल क्षेत्र, पदमपुर, देवपुर अथवा चित्रोत्पल्ला गंगा क्षेत्र के परसिद्ध नाव राजिम कइसे होइस। ये प्रश् घलो सोचनीय आय। काबर कि श्रीविग्रह युक्त भगवान बिसनू के प्रतिमा के संबंध राजीव घलो येही नाम से है। फेर राजिम के उल्लेख पहली, प्राचीन कालपुराना समय में नइ आए है। ये खातिर ये जरूरी हो जाथे कि जम्मो संदर्भ ल लहुट के देखे जाए।

अइसन स्थिति म, परमान के खातिर जम्मों बात ल तीन भाग में बांटे जा सकत है। 1. अधिक पुराना (पौराणिक) 2. इतिहास अउ 3. जन-जन के मानता। ऊपर के तीनों परसंग में दू-दू ठक बात अउ समाए हे।

1. पौराणिक (अधिक पुराना):- एकर अनुसार भगवान बिसनू के नाव पौरानिक कथा किस्सा कहानी के आधार है। येकर अनुसार पदमपुर कमल के समानार्थी सब्द आए तेखर सेती भगवान के मूर्ति के नाम राजीव होगे। भगवान बिसनू के कमल के समान अरथ वाले अनेक नाव चलन में हे- जइसे राजीव लोचन, कमल नयन, सरसीज नयन, पदमनेत्त इत्यादि अउ बाद में रूप बिगड़ के राजिम होइस। इहां ये बात ध्यान रखे के हे कि येकर आधार जन-जन के धारमिक भावना ले हावे। येकर सेती ये सब्द राजिम के राजिम हो जाना ठीक नइ लागय काबर इहां के लोगन, धरम के पक्का होथे, धरम के बारे म सावधानी रखते, के हे जा सकत हे कि धरम के एको ठन बिधान में बदलाव नइ कर सकय काबर देवता नाराज हो जाही। इहां के जन-जन तो अपन जम्मो धन-दौलत ल लुटाके समरपन भाव ले धारमिक जात्रा करथें। धरम के काज करथे। अइसन में राजीव लोचन ल राजिम लोचन कहे के हिम्मत तक नइ कर सकय। ये सेती राजीव के राजिम रूप ल बनाना इहां के धारमिक जन-जन बर उचित नइ आय। इतिहासकार डॉ. बिसनू सिंह ठाकुर रायपुर वाले ह राजिम पुस्तक में येही नाव ल आधार मानथे। उनकर सुभाव धारमिक हो सकत हे।

2. एतिहासिक:- एकर बाद अब दूसर बात हे, इतिहास के। जेखर आधार ताम्रलेख (तांबा के पत्तर में लिखे गए संदेशसूचना) में लिखाय राजमाल शब्द आय। ये ताम्रलेख तांबा लेख राजीवलोचन मंदिर मण्डप के भीतिया में जड़े हुए है। अइसन लगथे कि ये लेख ह जनवरी 1145 ई. के लिखे गे होही। जेकर अनुसार जगतपाल नाव के नामी सेनापति ह अपन बड़े बबा राजमाल के नाव में बढ़ौत्री खातिर एक ठन नगर बसाय रीहिस, जेकर नाव रजिमालपुर होइस। येही नाम ह नानुक होके राजम बने होही। फेर अउ बदल के राजिम होगे। परसिद्ध अंगरेज इतिहासकार ए. कनिधम ह राजमाल बंस नाम ले ही राजम-राजिम के चलन मानथे। दूसर एक ठन अउ बात हे, किथे कि सोमवंश राज के समय में दूसरे बंस में कोनों राजीव नयन नाम के महान, परतापी राजा होय रीहिस तेकर सेती ये स्थानजगह ह राजिम कहाइस।

ऊपर के दूनों इतिहासकार के परमान ऐती-ओती थोकिन दीखथे, किन्तु नाम बदले अथवा नाव रखे खातिर इंकर कथन उचित नई लागय। इहां धियान दौ। राजमाल के नाम लिखना लिखई मंदिर बने के बाद में हो सकत हे। काबर कि वो ताबां लेख के डाढ़ 10वां में जगतपाल ह मंदिर ल बनवाइस अउ ओकर व्यवस्था खातिर एक ठन गांव शाल्मलीय ल दान घलो कर दिस। दूसर डहर यहू कहे जाथे कि राम मंदिर के तांबा लेख ल राजीवलोचन मंदिर के भीतिया में चिपका दिस है। इहां परसिद्ध इतिहासकार डॉ. व्ही.व्ही. मिरासी नागपुर वाले के अनुसार राजीवलोचन के मनदिर तो पहलीच ले बने रीहिस, तभो ले राजा जगतपाल देव ह थोड़ा बहुत सुधार कारज, साफ सफाई जरूर कराए रहीस। वइसनेच राजीव नयन नाम के राजा जरूर होय हे किन्तु वोहर अतेक बड़का बलवान अऊ प्रभावशाली नहीं रहीस कि ऊंकर बंस के लईका राजा मन ह ओकर नाम खातिर अतेक उदिम करतिस। ये सेती ये कहे जा सकत हे कि ये दूनों प्रमान इतिहास के प्रमान सही नइ लागत हे। ये म अउ खोज करे के जरूरत हे।

3. जनश्रुति:- अब आखरी प्रमान जन-जन में प्रचारित वो मानता है। ये मा प्रथम जन-जन कथन हे जेकर जानकारी अंगरेज इतिहासकार सर रिचर्ड जेकिन्स ह अपन प्रसिद्ध पुस्तक एशियाटिक रिसर्चेज पृष्ठ 503, जिल्द 35 में लिखे है। ये अनुसार भगवान श्रीराम के समय म राजीवनयन नाम के एक राजा रहिन जेकर राज के राजधानी इही नगर रीहिस। राजा ह भगवान राम के अश्वमेघ यज्ञ के घोड़ा स्यामकरण ल पकड़ के महानदी किनारे म तप करवैया रिसी कन्दर्पक ल समरपित कर दिस। जेकर एक मात्र कारन रीहिस कि भगवान राम के सेना ह रिसी के क्रोध ले नष्ट हो जाए। राजा राजीवनयन अपन काम में सफल घलो होइस। सत्रुघन ह सेना सहित समाप्त होगे। ए सेती भगवान श्रीराम सौहे इही नगर म आके, राजीव नयन राजा ल हरा दिस। भगवान ह राजा राजीवनयन ल, आदेस दिस कि इहां ओमन ओकर मूर्ति स्थापित करय। ये डाहर ऋषि ह घलो कुमार सत्रुघन ल सेना सहित जीवित कर दिस। तभे राजा ह बहुत बड़ राजमहल बनवाईस अउ भगवान श्रीराम के मूर्ति ल स्थापित करिस। अइसे मानता हे कि बाद में ही प्रतिमा ह राजीवलोचन के नाम ले प्रसिद्ध होइस अउ ये नगर ह राजिम कहाइस।

दूसर जन-जन मानता है कि राजिम नाव के एक तेलिन दाई के नाम म ये स्थान के नाम पड़िस। अगहन पुन्नी के दिन (सात जनवरी) जनम लेवइया, राजिम माता बचपनेच ले, धारमिक सुभाव पाए रीहिस। अइसन मानता घलो है कि सांझ कुन धरम चरचा में बिताए। पारिवारिक जीवन के बेवहारिक उपदेस बताए समझाए। यही कारन उंकर कीर्ति चारों डहर फैलत रही से। केहे जाथे कि एक समय के बात ये कि तेलिन दाई ह तेल बेचे ल जात रीहिस। तब रद्दा म पड़े एक पथरा ले ठोकर खाके गिर पड़िस अऊ ऊंकर सबो तेल एती-तेती गंवागे। बेचारी अपन सास अउ पति ले डांट खाए के डर में अबडेच दु:खी होइस। जमीन म गिरे तेल बरतन ल उही पथरा के ऊपर रखके, भगवान ले रो-रोके अरजी करे लागिस कि भगवान ओकर रच्छा करे। बहुत बेरा के बाद दु:खी मन ले घर जाए बर जब वोह अपने तेल के बरतन ल उठाय लगिस त ओला अचरच होइस, काबर कि वो बरतन ह मुहुं तक लबालब तेल ले भरागे रिहिस अउ एकर ले अचरज जादा होइस कि वो तेलिन दाई ह दिन भर किंजर-किंजर के तेल बेचिस तभो ले तेल नइ सिराइस। घर म दाई राजिम के मुंह ले ये घटना के बारे म पूरा बिस्तार से सुनके अचरज होइस पति देव अउ सास ल। दूसर दिन ओकर परछो लेबर सबो झन उही जगह गिन। फेर अचरज। नवा बरतन घलो तेल ले लबालब भर गे। अब त घर परिवार म योजना बनगे। प्रेरणा जागिस। भक्ति जागिस कि वो अक्षय फल दाता पथरा ल घर ले आना चाही। रात म पथरा ल खोद के निकाले गिस। फेर अचरज। वो पथरा उल्टा रीहिस, अउ सीधा करिन त वो साक्षात सौंहे भगवान बिसनू के चार भुजा वाला, करिया रंग के पवित्र मूर्ति राहय। वो मूर्ति ल घर म लाके श्रध्दापूर्वक वोला उही कमरा म रखे गिस जिहां घानी रहाय अउ तेल पेरे के काम होवय। रोज दिन मंगल आरती करे। प्रतिदिन घानी के शुद्ध तेल अरपित करैं, तेकर बाद अपन तेल के बेपार शुरू करै। राजिम माता के जीवन सादा अउ सरल सुभाव रीहिस। सहयोग बर हमेसा तियार राहय। धारमिक वातावरण सुनता सलाह के परिवार रीहिस राजिम मइया के।

ये ही समय म राजा जगतपाल ह दच्छिन कोसल के राजा रीहिस। राजा ल सपना में जन कलियान बर नवा मंदिर बनाय के आदेश होइस। राजा सपना के आदेशानुसार मंदिर बना डरिस। किन्तु ओ मंदिर में मूर्ति रखे बर, पवित्र अउ सिद्ध मूर्ति नइ मिलिस। अब तक पूरा राज भर म तेलिन दाई के साथ होय वो चमत्कारी घटना जानबा होगे रीहिस। प्रेरणा जागिस राजा म। संकल्प करिस कि उही मूर्ति ल ये बिशाल मंदिर म स्थापित करिहो। ए खातिर तेलिन दाई ल मुंह मांगा इनाम देके लालच दीस। कुछ लोगन कहिथैं कि मूर्ति के तऊल भार सोना लेना चाहिए। किन्तु ये बात सरासर गलत आय। काबर कि कोनो भगत ह अपन अराधना, भगवान खातिरबदला म कुछु नइ मांगे। तेलिन दाई ह घलो कुछु नइ मांगिस अउ रइपुर गजेटियर राजपत्र म लिखे गिस। इहां यहू बात सोचना-बिचारना चाही। दूसर बात राजा के आदेश आए जेकर हीनमान परजा कइसे कर सकही? तीसरी खुद तेलिन दाई ह वो सिद्ध प्रतिमा के प्रताप के अब धनवान होगे रीहिस। चऊथा कि खुद तेलिन दाई चाहत रीहिस कि अब वइसनेच अउ भगत हो जाये सब मिल जुलकर के भगवान के भक्ति करयं पांचवा यही कि अच्छा संरक्षण मिल जाए, राजा बरोबर त। वो ह निस फिकरि हो जाही अऊ आखिर म यहू बात सोचना चाही कि तेलिन दाई के भक्ति ह समरपन के आय, बदला म कछु चाहे या मांगे के नो है। यहां एक बात जरूर जानना चाही कि राजा के आदेस के बाद वो तेलिन दाई ह चौबिस घटना के मोहलत मांगिस। कहे जाथे कि वोमन रात म भगवान से आदेश मांगीन निवेदन करिन अउ दूसर दिन वो तेलिन दाई ह राजा ल वो चमत्कारिक मूर्ति सउप दिस। बस एकेच ठन निवेदन करिस राजा ले कि भगवान के नाम के आघू ओकरो नाम चलय। काबर कि अब वो पबरित मूरती ह तो तेलिन दाई के परान बरोबर होगे रीहिस न। राजा ल घलो सपना म अइसनेच आवाज आइस। राजा जगतपाल ल मूर्ति सउप दे गिस अउ वोही दिन ले भगवान ह राजिम लोचन के नाम से जाने पुकारे गिस। अब इहां यही विचार करे जा सकत हे कि कुछ बिदवान मन के ये जन-जन कथन म थोरिक संदेह है। ये कर खातिर ये दो ठन बात तरक विचार बताए जाना जरूरी हे कि-

1. ये कि जन-जन कथन के जगतपाल ह ऐतिहासिक पुरुष मनखे आय जेकर तुलना राजा जगतपाल से करे जा सकत है अउ वोकरेच लिखाय आदेश ह मंदिर के अंदर महा मण्डप के भीतरी दीवार म जड़ाय हावैं। 2. ये बड़े मंदिर के सामने राजेश्वर अउ दानेश्वर मंदिर के पीछू डाहर तेलिन मंदिर बने हे, ये ह अइसन परमान आय कि जन-जन कथन के अनुसार ये तेलिन मंदिर घलो वोही समय काल के बने आय।

इहां प्रो. रायबहादुर हीरालाल जी के ये प्रसिद्ध बचन ल बताना जरूरी है। ये कथन ह रइपुर जिला गजेटियर 1909 के पृष्ठ 333 म छपे हे कि यदि जन-जन कथन म सत्यांश हाबे, ऐतिहासिकता हाबे त ये माने ल परही कि वो तेलिन दाई ह अपन भगवान के सामने सती होय रीहिस। इही त समरपन भक्ति आय। ये परकार ले ये कहे जा सकत हे कि राजिम नाव, हमर बंस गौरव, भगत सिरोमनी माता राजिम के नामेच है। यही मानता घलो है। सबो जगह प्रचारित है।

अब इही बात म थोकिन राजिम तेलिन मंदिर के ऐतिहासिक परमान ल घलो बिचार कर लेना जरूरी है। पहली कि माता राजिम ह निसुवारथ भक्ति, परेम के कारण जन-जन के भलईबर राजा जगतपाल ल मूर्ति दीस। डॉ. के.डी. बाजपेयी सागर वाले ह बहुत प्रसिद्ध इतिहासकार आय, तेकर अनुसार ये प्रतिमा मंदिर बने के पहली आय। दूसर तेलिन मंदिर के गर्भगृह म जो सती स्तम्भ पट है वोहर सच के परमान आय। तीसर राजिम दाई ह मूर्ति म तेल चुपरके अपन जम्मो काम के सुरूआत करै वो परम्परा नियम आज तक चले आथै। अइसनेच भगवान के भोग परसाद ह तेलिन मंदिर घलो पहुंचाय जाथे यहू परम्परा हे। हां प्राप्त लेख के अनुसार राजिमलोचन के मंदिर बनाय के समय नवीं या दसवीं सदी माने जाथै। डॉ. व्ही.व्ही मिरासी नागपुर वाला ह ऐला आठवीं सदी मानथै। त का तेलिन दाई के मंदिर घलो ये ही समय म बने होही? ये सच बात आय कि पंचायतन सैली म बने राजीव लोचन मंदिर के चारों डाहर बिसनू अवतार के मंदिर बनाए गे है। (1) उत्तर म बदरीनारायन मंदिर (2) दच्छिन वामन मंदिर (3) पूरब म बाराह मंदिर (4) पश्चिम म नरसिंह मंदिर। राजीव लोचन एकेच आधार जगत म बनाए गेहे तेकर बाद ये मंदिर मन ला बनाए गे हो ही। राजीव लोचन मंदिर अउ तेलिन मंदिर के बीच बहुत जगह रीहिस। ये येखर सेती तेलिन दाई ह अपन भगवान के ठीक सामने, पूरब मुखी म विद्यमान हे। मतलब ये कि तेलिन दाई के मंदिर ह घलो वोही समय बनाय गे होही जेन समय म वो चारों अवतार के मंदिर मन ला बनाए गेहे। ये जम्मों मंदिर मन ह 8वीं ले 14वीं सदी के मध्य म जरूर बनाए गे होही। इहां यहू परमान माने जा सकत हे कि तेलिन मंदिर के गरभगृह वाला भाग प्राचीनपुराना आय, काबर कि (1) तेलिन मंदिर के नाव उन चारों मंदिर मन के साथ-साथ ले जाथे। (2) भकतिन तेलिन मंदिर म गर्भगृह मात्र है, ये सती मंदिर आय, इहां सात्विक भाव जरूरी है। येखर सेती महामण्डप नइ बनाय गीस। आराध्योन्मुखी दुवार खुला-खुला रखिन। (3) स्मारक सती मंदिर के कारण घलो महामण्डप नई बनाय जाय। (4) वर्तमान तक राजीव लोचन मंदिर, रामचंद मंदिर अउ तेलिन दाई मंदिर म परिक्रमा पथ हावै। (5) जम्मो आगे मंदिर मन के शिखर स्थान ह नागर सैली में है। (6) भक्तिन मंदिर के शिखर आमलक सैली एवं पूरा कलस वाला है, राजीव लोचन मंदिर कस आयुध वाला शिखर नई है। (7) तेलिन मंदिर के वितानेच ह ऐकर पुराना होये के परमान आय। (8) इतिहासकार डॉ. बिसनू सिंह ठाकुर रइपुर वाले ह ये मंदिर ल कलचुरि कालीन मानथे।

ऊपर के अतेक परमान ले ये खुदेच परमानित होथे कि राजिम तेलिन मंदिर ह अबडेच पुराना आय। अब थोकिन तेलिन मंदिर के भीतरी भाग में दिखाये परतीक के बारे म घलो बिचार करना चाही। भकती साधना ल बतावत पूजा खातिर एक सिलापट ऊंचा जगह मा भितिहा ले जोड़के रखेगे है। ऐकर ऊपरि भाग में खुला हथेरी सुरुज, चंदा अउ एक ठन पूरा घड़ा आकार बताए हे। नीचे एक पुरुष अउ नारी पदमासन मां बइठे हाथ जोड़े प्रार्थना करत हे। दूनों के बाजू मा एक सहायिका भी हावै। सिलापट के बीचोंबीच मध्य भाग म बइला सहित कोल्हू घानी के रूपायन हे। वास्तव में प्रो. टी.ए. गोपीनाथ राव दिल्ली (एजीमेंट ऑफ हिन्दू आई को नोग्राफी पृष्ठ 2781) के अनुसार ये ह सत्ती स्तम्भ आय। ये में अज्ञान अउ माया के बसीभूत या बस में रहवइया जीव आत्मा के दसा के बरनन घानी अऊ बइला ल प्रतीक मान के करेगे हे। तथा यहू बताए गे हे के धरम के आचरण करही तभे मोच्छ शांति मिलही ये ही सच्चा संदेस बताए है। भारतीय परतीक विगयान म बइला सांड ह धरम से संबंधित है। निरूक्त 3.1.6 के अनुसार घानी के खाल्हे वाला भाग ऊखल के चिन्हा आय। सक्ति तत्व के अनुसार शिवतत्व घलो ह स्थाणुऊखल रूप म होथे। तइसनेच घानी अउ बइला ह हमरे काम बेपार के प्रतीक आय। अब ओ पइत राजा ल जऊन समझ म विचार मा अइस वोमन भगवान के आदेश अउ भकतिन राजिम के इच्छानुसार, राजिम ल दिए बचन के अनुसार भगवान के ठीक सामनेच म य मंदिर ल बनवाइस अउ बचन के पालन करके ऋण से मुक्त होगे।

कुछ बिद्वान मनके अइसना घलो बिचार है कि भगवान बिसनू के वो ही प्रतिमा ल माता राजिम अपन सब कुछ माने वो ह राजिम मइया के आंखी (लोचन) आय। ओकर बिना जग अंधियार। अब वोही भगवान प्रतिमा मंदिर में स्थापित होगे तब राजिम मइया ह दिन-रात ओकर सामने बइठे निहारत राहय, टक-टकी लगा के देखत राहय खाना-पीना घलो के सुध-बुध नइ राहय। माने जाथे कि अइसनेच साधना अवस्था मा माता राजिम ये दुनिया ले मुक्त होगे। माता राजिम के आत्मा ह परमात्मा म मिलगे। भकतिन राजिम मइया के मंदिर घलो इही परकोटा म बने हे। सती स्तम्भ के प्रतीक ह भक्ति साधना के पहचान आय। ये घटना 12वीं सदी के आय अइसनेच मानता है। वइसे एकदम सही सफा-सफी बात माने जाथे।

ये परकार से कहे ये जा सकत है कि हमर तेली बंस के कल्यानी भक्तिन माता राजिम ह सबो जाति, धरम के लोगन खातिर भगवान दरस ल कराइस। आज भगवान के दरसन के बाद हर भगत ह ये महान देवी के सत्ती स्तम्भ के दरसन, परिक्रमा करके अपन जात्रा ल पूरा करथे शांति पाथे।

*तुहर मन के*
*रामगुलाल साहू*