Saturday, 11 August 2018

आँखें

आँख मारकर उससे, मैंने आँखें चार की।
आँख खुली तो देखा, उसने आँखों से वार किया॥

आँख हमारी आयी तो ,आँखे फेर कर चली गई।
आँख मिला न सकी वो,आँख हमसे मली गई॥

आँखें बिछाकर बैठे थे हम, आँखें पथरा गई।
आँखें बदल गई उनकी, आँखें दिखाकर भाग गई॥

कभी आँख के पुतली थे, अब आँखों के कांटे हैं।
आँखें बचाकर हमसे वो, हमपें ही आँखें गड़ाते हैं॥

आँख उठाकर देखती क्या,उसकी आँखे नीचे हो गई।
मेरे आंखों में गिरकर,उसकी आँखों में नीर भर गई॥

हमने आँखें मुंद ली तो,आँखें मिलाने आ गई।
आँख लगाकर हमको वह,आँख सेककर चली गई॥


रचना : विरेन्द्र कुमार साहू
        बोड़राबांधा (पाण्डुका)
        जिला -गरियाबंद(छ. ग.)
       08/08/2018

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