Thursday, 4 July 2019

बाढ़त गरमी


बाढ़त गरमी सरसी छंद मा

गनगन  गनगन  चढ़गे  पारा , थर्रागे     संसार।
बाढ़त  गरमी  काखर सेती,साथी  करौ बिचार।।

पिघलत हावै बरफ पहाड़ी,मुश्किल लेवइ साँस।
आनी-बानी बिपदा सेती ,कतको जीव  उदास।।

चेत  करौ  अभ्भो  बाँचे हे , होय  नहीं  हे  देर।
अब ले तब अउ ज्यादा होही ,आँखी देहु नटेर।।

जतन करौ जंगल पानी के ,तभ्भे  बँचही  प्रान।
छोड़ सुवारथ पेड़ लगाओ ,हरियर करौ जहान।।

धुआं बढ़ाथे तिपनी भारी ,अउ  फइलाथे रोग।
बिना प्रदूषण नवा ढंग ले , लगे  सबे   उद्योग।।

बाग बगीचा  गाँव-गाँव मा , बनवावौ  सरकार।
बाढ़त तिपनी खातिर येहर,आज हवय दरकार।।

जम्मों सरकारी आफिस मा,भेजौ  ए फरमान।
पेड़ लगाओ विश्व बचाओ ,लेवौ  कर अनुदान।।

साधक : विरेन्द्र कुमार साहू
  

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