सौ सौ धोखेबाज से , मित्र एक ही नेक।
गदहा के सौ लाल से , अच्छा सिंह का एक॥
विषम समय पर मित्र की , होती है पहचान।
रहा भरोसेमंद तो , जीवन स्वर्ग समान॥
सेवक पत्नी पुत्र का , है सहयोग महान।
रहे भरोसेमंद तो , जीवन स्वर्ग समान॥
सुमिरौं सिद्ध गणेश को , बंदौ अंजनिसूत।
रोग दोष भव काटिए , विद्या मिले अकूत॥
जन्मभूमि जननी सरिस , दूजा नहीं महान।
कर देना इनके लिए , सौ जीवन कुरबान॥
शीतल छाया नीम की,कड़वा इनका मूल।
औषधि लाखों मर्ज की,उपयोगी फल फूल॥
रिश्ते नाते टुटने लगे , मन भी व्याकुल होय।
धीरे धीरे सब घटे , रोगी तन जब होय॥
जल जीवन का मूल है ,नीर बिना सब शून्य।
जल संरक्षण कार्य कर , मिले बहुत ही पुण्य॥
मन का मैल दिखे नहीं , जब मीठा हो बोल।
लेकिन कृत्रिम कर्म का , खुल जाता है पोल॥
राग रंग रस रम रही , राधा रानी रास।
मया मगन मन मातगे , मनमोहन की आस।
Sad parent at home if ,
it's not much well.
Such children are damn,
fool will Go to hell..
हिन्दी
पिता दुखी घर पर अगर , ना है अच्छी बात।
बेटा को धिक्कार है , नरक मिले सौगात॥
निंदा :-
कहता सच हूँ माँ कसम , निंदा है बेकार।
पता चले यदि बाद में , बढ़ जाये तकरार॥
निंदा कभी न कीजिए , जो खुद से लघु होय।
छोटा तिनका भूल से , आँख लगे दुख होय॥
आँखों से आंसू बहा , दिल ने बोला आह।
तब कविता होगी बनी , कहा सभी ने वाह॥
ऋतुओं पर :-
आया ऋतु बसंत का , फूले फूल पलास।
बूंद ओस की खो गई , मधुर मधुर आभास॥
कविता :-
कवि की कविता आग है , जले शत्रु लंगोट।
लाठी बनकर अक्ल पर , करदे गहरी चोट॥
पुलवामा घटना पर दोहे:-
भारत भू के भाग में , जीवित हैं जयचंद।
नहीं अंत आतंक का , होय न घटना बंद॥
करिए पहला काम यह , खोजो तुम गद्दार।
पकड़ पकड़ कर मार दो , जितने हैं मक्कार॥
कब - तक भारत वर्ष ये , झेलेगा आतंक।
उचित समय पर काट दो , उनके सारे अंक॥
कुत्ते की दुम पाक का , अगर यही आगाज़।
सर्वनाश नापाक हो , भारत की आवाज़॥
नहीं संधि ना बात हो , चाह नहीं है शांति।
इंकलाब आगाज़ हो , गुंजे घर-घर क्रांति॥
यदि सीना छप्पन इंच का , मारो शेर दहाड़।
करदो एक प्रहार में , दुश्मन को दो फाड़॥
बैरी के इस काम पर , मानस में भर क्रोध।
जस को तस ही दीजिए , याद रहे प्रतिशोध॥
चिंता :-
चिंता करना ना कभी , जीवन में इंसान।
चिंता चंचल चित करे , चिंता मृत्यु समान॥
आर्य :-
जीना मरना देश पर , है वंदनीय कार्य।
मातृभूमि पर जान दे , कहलाये वह आर्य॥
रहे सदा स्वीकार्य॥
दौर बुरा यदि चल रहा , मन में रख विश्वास।
अपनी छवि भी ना दिखें , दर्पण ना हो पास॥
दारू समर्थक (हास्य)
दारू पीकर तुम बनो , प्यारे सुबुद्धिमान।
दुध को पीते ही नहीं , समझदार इंसान॥
दुध को पीना है भला , बैल बुध्दि पहचान॥
गौधन समर्थक (गंभीर)
दुध साधारण है नहीं , देती जो माँ गाय।
तन मन को संबल करे , और बढ़ाते आय॥
दारू कभी न पीजिए , पीना है बेकार।
तन मन धन का नाश हो , बिखरे घर परिवार॥
लोकतंत्र
जनता की सहभागिता , लोकतंत्र की नींव।
जागरूकता के बिना , समझ इसे निर्जीव॥
लालच डर भय रोग है, अनपढ़ता अभिशाप।
अपने मत को बेचना , बहुत बड़ा है पाप॥
लोकतंत्र के पर्व में , सभी बटाएं हाथ।
सुंदर शासन के लिए , चलों निभाएं साथ॥
चिंता करना ना कभी , जीवन में इंसान।
चिंता चित चंचल करे , चिंता मृत्यु समान॥
सुबह सुबह का टहलना , फलदायी भरपूर।
पुलकित साधक जन रहे , आलस भागे दूर॥
गुरू मिले सौभाग्य से , हरि सम है नवकार।
अर्पित तन मन को करें , होंगे भव से पार॥
ज़िना वतन ही के लिए , पुजा योग्य है कार्य।
मातृभूमि सम कुछ नहीं , कहे कहलाये आर्य॥
जबसे आया है जियो , सरपट चलते नेंट।
वाटसेप या फेसबुक , पर होती है भेंट॥
अलख जगाने देश में , बन जाऊँ शुभ काव्य।
जागृत करूँ समाज को , हो मेरा सौभाग्य॥
मैं भी कवि कहला सकूँ , होगा यह सौभाग्य।
चोरी करने पर लगे , धारा दो सौ सात।
तीन बरस तक जेल में , काटोगे दिन रात॥
अच्छे दिन पीछे गये , कुछ ना हुए विकास।
सकल समस्या रह गई , अब किस पर विसवास।
बलिष्ठ॥
सुंदर पाचन के लिए , मत कर भोज गरिष्ठ।
मातृभूमि प्रेमी नहीं , करे सदा अपमान।
कालिख माँ की कोख की , ऐसे सब संतान॥
दोहा :-
बेटी की ना जान लें , दानव दुष्ट दहेज।
संस्कृत सभ्य समाज सब , करें इसे परहेज॥
इंद्रियनिग्रह के बिना , जो हैं बनें महंत।
ऐसे दुर्जन दुष्ट से , रहना दूर अनंत॥
देश प्रेम के नाम पर , पीट रहे हैं ढोल।
स्वारथ की जब आ पड़े , बदले इनकी बोल॥
सत्ता जन के हाथ मा , बहुजन हित शुभ मंत्र।
तौर तरीका राज के , कहलाथे गणतंत्र॥
लोकतंत्र मा शक्ति सब , रइथे जनता तीर।
रहय अशिक्षा जब तलक , नइ बदले तकदीर॥
सभी मनाते हर्ष से , होली क्रिसमस ईद।
कारण केवल वीर वह , कहते जिन्हें शहीद॥
खुशियों का शुभ हेतु है , जिनके पावन कृत्य।
ऐसे वीर शहीद को , समझ सदा ही स्तुत्य॥
राष्ट्र धर्म पर त्याग का , सिखलाते संदेश।
करते त्याग शहीद तन , हरते जन के क्लेश॥
बहिनी भाई दूज के , करय अगोरा खास।
बाँधे रक्षा डोर अउ , करय मया के आस॥
यम अउ यमुना के मया , जानय सकल जहान।
भाई बहिनी के परब , भाई दूज महान॥
फागुन महिना के हवा , लाय हवय संदेश।
मनखे मनखे मा बढ़े , मया पिरीत विशेष॥
फागुन महिना के हवा , लाय हवय संदेश।
बैर भाव ला छोड़ के , बदलव जी परिवेश॥
सुन संगी संसार ला , कड़वा मीठा जान।
मड़वा महकत कल मधुर , बनगे आज मसान॥
राधा रानी संग मा , कान्हा रास रचाय।
मया रंग मा मात के , होली परब मनाय॥
आनी बानी के परब , भारत के पहिचान।
सबो धरम अउ जात के , होय इहाँ सम्मान॥
बैठ किसन कन्हैया कदम , छेड़ छटा छवि तान।
मगन मयूरा मन मातगे , मुरली मधुर महान॥
श्याम सलोना संग सब , यमुना के मैदान।
मगन मयूरा मन मातगे , सुन बंशी के तान॥
ढोल नगाड़ा गहगहे , फागुन फाग तरंग।
होली के त्यौहार हा , मन मा भरय उमंग॥
होली रंग तिहार मा , रंग प्रेम के घोल।
पिंवरा लाल गुलाल ले , प्रेम रंग अनमोल॥
होली के हुड़दंग ला , मजा उड़ाके खेल।
डर्रा भागे रंग जे , घुरवा डहर ढकेल॥
होली राग मल्हार मा , कबिरा करय अलाप।
गाँव गली के बीच मा , बाजय माँदर थाप॥
कवि : विरेन्द्र कुमार साहू
ग्राम : बोड़राबाँधा (पांडुका)
जिला : गरियाबंद(छ. ग.)