Thursday, 27 June 2019

ददा उप्पर छत्तीसगढ़ी दोहा


आज के विषय :- *"ददा"*

ददा नीम के पेड़ जस , कड़वा जड़ फल पान।
देवय शीतल  छाँव अउ , दवा  रोग  बर  जान॥

ददा   रहे    ले  सब   रहे , होवय   पूरा   शौंक।
हो कतनो गलती तभो, कुकुर सकय नइ भौंक॥

ददा बनो दशरथ सरिस , सुत बर स्वारथ त्याग।
तुमन  अपन संतान बर , छोड़व   दारू   भाँग॥

ददा - कृपा  ले  सब  मिले , केरा  आमा   सेव।
इनकर  जीयत ले अपन ,  शौक  पूर्ण कर लेव॥

सुत  अमीर  बनगे  भले , पर   पैसा   बर  रोय।
ददा  गरीब  कमाय  जब ,शौक  पूर्ण  तब होय॥

सुखी  ददा  दाई रखय , जब  बेटा  निज  पास।
देवय  तब   ही  देवता , धन  वैभव  पद खास॥

दाई  ददा   ल   मानबो  ,  जब   देवी   भगवान।
तभे  यकीनन  बन  जही , हर घर  सरग समान॥

रचना : विरेन्द्र कुमार साहू

विरेन्द्र के दोहे

सौ  सौ  धोखेबाज  से , मित्र एक  ही  नेक।
गदहा के सौ लाल से , अच्छा सिंह का एक॥

विषम समय पर मित्र की , होती है पहचान।
रहा   भरोसेमंद  तो , जीवन   स्वर्ग  समान॥

सेवक  पत्नी  पुत्र  का , है  सहयोग  महान।
रहे   भरोसेमंद  तो , जीवन   स्वर्ग    समान॥

सुमिरौं सिद्ध गणेश को , बंदौ अंजनिसूत।
रोग दोष भव काटिए , विद्या मिले अकूत॥

जन्मभूमि जननी सरिस , दूजा  नहीं  महान।
कर  देना  इनके लिए , सौ  जीवन  कुरबान॥

शीतल छाया नीम की,कड़वा  इनका  मूल।
औषधि लाखों मर्ज की,उपयोगी फल फूल॥

रिश्ते नाते टुटने लगे , मन भी व्याकुल होय।
धीरे  धीरे  सब  घटे , रोगी  तन  जब  होय॥

जल जीवन का मूल है ,नीर बिना सब शून्य।
जल संरक्षण कार्य कर , मिले बहुत ही पुण्य॥

मन का मैल दिखे नहीं , जब मीठा  हो  बोल।
लेकिन कृत्रिम कर्म का  , खुल जाता है पोल॥

राग रंग रस रम रही , राधा रानी रास।
मया मगन मन मातगे , मनमोहन की आस।

Sad parent at home if ,
it's not much well.
Such children are damn,
fool will Go to hell..

हिन्दी

पिता दुखी घर पर अगर , ना है अच्छी बात।
बेटा  को  धिक्कार  है , नरक मिले  सौगात॥

निंदा :-

कहता  सच  हूँ माँ  कसम , निंदा है  बेकार।
पता  चले यदि  बाद में , बढ़  जाये  तकरार॥

निंदा कभी न कीजिए , जो खुद से लघु होय।
छोटा तिनका भूल से  , आँख  लगे दुख होय॥

आँखों  से आंसू बहा , दिल ने बोला  आह।
तब कविता होगी बनी , कहा सभी ने वाह॥
ऋतुओं पर :-

आया  ऋतु   बसंत  का , फूले  फूल  पलास।
बूंद ओस की  खो गई , मधुर  मधुर  आभास॥

कविता :-

कवि की कविता आग है , जले  शत्रु   लंगोट।
लाठी बनकर  अक्ल पर , करदे  गहरी   चोट॥

पुलवामा घटना पर दोहे:-

भारत  भू  के  भाग  में , जीवित  हैं  जयचंद।
नहीं  अंत  आतंक  का , होय  न  घटना  बंद॥

करिए  पहला  काम  यह , खोजो  तुम गद्दार।
पकड़ पकड़ कर मार दो , जितने  हैं मक्कार॥

कब - तक  भारत  वर्ष  ये , झेलेगा   आतंक।
उचित समय पर  काट दो , उनके  सारे  अंक॥

कुत्ते की दुम पाक का , अगर  यही  आगाज़।
सर्वनाश  नापाक  हो  , भारत   की  आवाज़॥

नहीं  संधि  ना  बात हो , चाह  नहीं  है शांति।
इंकलाब   आगाज़  हो , गुंजे  घर-घर  क्रांति॥

यदि सीना छप्पन इंच का , मारो शेर दहाड़।
करदो  एक  प्रहार में  , दुश्मन को दो फाड़॥

बैरी  के इस  काम पर , मानस में भर  क्रोध।
जस को तस ही दीजिए , याद रहे  प्रतिशोध॥

चिंता :-

चिंता करना ना कभी , जीवन  में  इंसान।
चिंता चंचल चित करे , चिंता मृत्यु समान॥

आर्य :-

जीना मरना  देश पर , है  वंदनीय    कार्य।
मातृभूमि पर  जान दे , कहलाये वह आर्य॥
रहे सदा स्वीकार्य॥

दौर बुरा यदि चल रहा , मन में रख  विश्वास।
अपनी छवि भी ना दिखें , दर्पण ना हो पास॥

दारू समर्थक (हास्य)

दारू  पीकर  तुम बनो , प्यारे सुबुद्धिमान।
दुध को पीते  ही नहीं , समझदार   इंसान॥
दुध को पीना है भला , बैल बुध्दि पहचान॥

गौधन समर्थक (गंभीर)

दुध  साधारण  है नहीं , देती  जो माँ गाय।
तन मन को संबल करे , और बढ़ाते आय॥

दारू   कभी   न   पीजिए , पीना   है  बेकार।
तन मन धन का नाश हो , बिखरे घर परिवार॥

लोकतंत्र

जनता की  सहभागिता , लोकतंत्र  की  नींव।
जागरूकता  के बिना , समझ  इसे   निर्जीव॥

लालच डर भय रोग है, अनपढ़ता अभिशाप।
अपने  मत को  बेचना , बहुत  बड़ा है   पाप॥

लोकतंत्र  के  पर्व  में , सभी    बटाएं    हाथ।
सुंदर  शासन  के  लिए , चलों  निभाएं साथ॥

चिंता करना ना कभी , जीवन में   इंसान।
चिंता चित चंचल करे , चिंता मृत्यु समान॥

सुबह सुबह का टहलना , फलदायी  भरपूर।
पुलकित साधक जन रहे , आलस भागे दूर॥

गुरू मिले सौभाग्य से , हरि सम है नवकार।
अर्पित तन मन को करें , होंगे भव  से  पार॥

ज़िना वतन ही के लिए  , पुजा योग्य है कार्य।
मातृभूमि सम कुछ नहीं , कहे कहलाये आर्य॥

जबसे आया है जियो , सरपट चलते नेंट।
वाटसेप या फेसबुक , पर  होती  है  भेंट॥

अलख जगाने देश में , बन जाऊँ शुभ काव्य।
जागृत करूँ समाज को , हो  मेरा   सौभाग्य॥

मैं भी कवि कहला सकूँ , होगा यह सौभाग्य।

चोरी करने पर लगे , धारा दो सौ सात।
तीन बरस तक जेल में , काटोगे दिन रात॥

अच्छे दिन पीछे गये , कुछ ना हुए विकास।
सकल समस्या रह गई , अब किस पर विसवास।

बलिष्ठ॥
सुंदर पाचन के लिए , मत कर भोज गरिष्ठ।

मातृभूमि  प्रेमी   नहीं ,  करे  सदा   अपमान।
कालिख माँ की कोख की , ऐसे   सब संतान॥

दोहा :-
बेटी   की   ना  जान लें , दानव  दुष्ट  दहेज।
संस्कृत सभ्य समाज सब , करें इसे परहेज॥

इंद्रियनिग्रह के बिना , जो हैं बनें महंत।
ऐसे  दुर्जन  दुष्ट से , रहना  दूर  अनंत॥

देश प्रेम के नाम पर , पीट रहे हैं ढोल।
स्वारथ की जब आ पड़े , बदले इनकी बोल॥

सत्ता जन के हाथ मा , बहुजन हित  शुभ मंत्र।
तौर    तरीका   राज   के , कहलाथे   गणतंत्र॥

लोकतंत्र  मा शक्ति  सब , रइथे   जनता  तीर।
रहय अशिक्षा जब तलक , नइ बदले तकदीर॥

सभी मनाते  हर्ष  से , होली    क्रिसमस  ईद।
कारण  केवल वीर वह , कहते  जिन्हें शहीद॥

खुशियों का शुभ हेतु है , जिनके पावन कृत्य।
ऐसे  वीर  शहीद  को , समझ  सदा ही स्तुत्य॥

राष्ट्र  धर्म  पर  त्याग  का , सिखलाते  संदेश।
करते त्याग शहीद तन , हरते  जन के क्लेश॥

बहिनी भाई दूज के  , करय अगोरा खास।
बाँधे रक्षा डोर अउ , करय मया के  आस॥

यम अउ यमुना के मया , जानय सकल जहान।
भाई   बहिनी   के   परब , भाई   दूज    महान॥

फागुन महिना के हवा , लाय हवय संदेश।
मनखे मनखे मा बढ़े , मया पिरीत विशेष॥

फागुन महिना के हवा , लाय  हवय संदेश।
बैर भाव ला छोड़ के , बदलव जी परिवेश॥

सुन   संगी    संसार   ला , कड़वा मीठा जान।
मड़वा महकत कल मधुर , बनगे आज मसान॥

राधा रानी  संग मा  , कान्हा  रास रचाय।
मया रंग मा मात के , होली परब  मनाय॥

आनी बानी के परब , भारत  के पहिचान।
सबो धरम अउ जात के , होय इहाँ सम्मान॥

बैठ किसन कन्हैया कदम , छेड़ छटा छवि तान।
मगन मयूरा मन मातगे , मुरली मधुर महान॥

श्याम सलोना संग सब , यमुना के  मैदान।
मगन मयूरा मन मातगे , सुन बंशी के तान॥

ढोल नगाड़ा गहगहे , फागुन फाग  तरंग।
होली के त्यौहार हा , मन मा भरय उमंग॥

होली  रंग  तिहार  मा , रंग  प्रेम  के घोल।
पिंवरा लाल गुलाल ले , प्रेम रंग अनमोल॥

होली के हुड़दंग ला , मजा उड़ाके खेल।
डर्रा  भागे  रंग  जे  , घुरवा डहर ढकेल॥

होली राग मल्हार मा , कबिरा करय अलाप।
गाँव गली के बीच मा , बाजय  माँदर  थाप॥

कवि : विरेन्द्र कुमार साहू
ग्राम : बोड़राबाँधा (पांडुका)
जिला : गरियाबंद(छ. ग.)

सद्गुरु पर दोहे


विषय :सद्गुरु

१.
सद्गुरु  सम  संसार  में , दाता   कहीं न और।
सद्गुरु  ही  भगवान है , सद्गुरु  ही  सिरमौर।।
२.
गुरु मिलता  सौभाग्य से , हरि समान नवकार।
तन-मन-धन  अर्पित करें , होंगे  भव   से  पार।।
३.
केवल ही सद्गुरु कृपा , जग कल्याण निकाय।
ज्ञान मिले  ना गुरु बिना , करलो  लाख  उपाय।।
४.
सद्गुरु की सेवा करो , समझ सकल  सुर संत।
निर्मल  सेवा  से  मिले , सद्गुरु    कृपा  अनंत।।
५.
निर्भय  होकर  सौंप  दो , नौका  कर  नवकार।
चिंता फिर किस बात की , जब गुरु  खेवनहार।।

रचनाकार :
नाम : विरेन्द्र कुमार साहू
पता : ग्राम बोड़राबांधा (राजिम)
मो. न. 9993690899

छत्तीसगढ़ी हास्य


पतरेंगी  अस  छोकरी , आये  रोज बजार।
अंतस  ओला  देख के , गाये  गीत  हजार।।

डर के मारे नइ कहँव , अपन हृदय के बात।
तभो समझ वो जाय जी , मोर सबे जज्बात।।

तूमा  भाँटा  ले  सजे , पसरा  लागे   नीक।
घेरी   बेरी  प्यार ले ,  बात करय सब ठीक।।

आवत जावत कहि परौं,का राखे हस हीर।
वोहर कहि  दे  हाँव ले , आई  लभ यू वीर।।

बड़ लजकुरहा आँव मैं , लागय मोला लाज।
बाजय गदकड़ गद तभो , एक सार के साज।।

मिर्चा  भाटा  संग  मा , लेवौं  रोज  पताल।
बइठौ पसरा मेर ता , अपन  बतावय  हाल।।

भरगे  पीरा  मूड़  मा , करम  फाटगे मोर।
सब्जी वाली छोकरी , कहिस हरौ मैं तोर।।

विरेन्द्र कुमार साहू

उल्लाला छंद मा छत्तीसगढ़ी रचना

गुरु  सिरतोन   महान  हे , धरती   के  भगवान हे।
बंदौं  गुरु  के पद  कमल ,काटे जे सब भव प्रबल।।

गुरुवर   तोर   अराधना , मोरे   जीवन     साधना।
करहु कृपा मुझ दीन पर,सकल कला गुणहीन पर।।

बहुत बुरा हे माँगना , भला मरन स्वीकारना।
माथा ऊँचा राखना , लालच  लंका  त्यागना।।

झन खा पर के खीर ला , झन पी पर के नीर ला।
नाच नहीं पर हाथ मा , स्वाभिमान रख साथ मा।।

डरबे झन तैं हार ले , बुरा समय व्यवहार ले।
बाद हार  के जीत हे , इही  जगत के रीत हे।।

फल आशा त्यागो लखन,मिहनत कर होके मगन।
लगे  फूल  फल  याद  मा , बरसों  बीते  बाद  मा।।

सबर करौ होके मगन , घुरुवा मा बनथे भवन।
बाद  हार  के जीत  हे ,इही  जगत  के  रीत हे।

कूड़ा कचरा  ला धरे , काम  नेक घुरुवा करे।
बदले जैविक खाद मा , करे मदद उत्पाद मा।।

तन ला घुरवा झन बना , नशा पान मा झन सना।
मानुष  तन  अनमोल हे , इही  संत  के   बोल हे।।

सपना   धरे  सुराज  के , उज्जर सुग्घर  राज के।
जुरमिल भीड़व काज मा,सुनता रखौ समाज मा।।

जरगे  सुनता  राग मा , बैर भाव  के  आग मा।
छोड़ौ गरब गुमान ला , लानव नवा बिहान ला।।

सपना  मा  गाँधी  बबा , गुस्सा  ला  मन मा दबा।
आइस  मोरे   पास  मा , राम  राज  के  आस मा।।

सपना  ला सिरतोन कस , करही पूरा कोन जस।
मन मा मैं रहिथो गुनत , मुखिया के भाखा सुनत।।

नेता  भुलगे  निज धरम , करत हवय गंदा करम।
परथे  डाँका  लाज मा , अब  का होही  राज मा।।

सुग्घर सपना ठान लो , हाथ धनुष अउ बान लो।
कमर  बाँध  लो  हे सखा , बैरी  ला  धुर्रा  चखा।।

आलस जब करबे नहीं , सपना तब होही सहीं।
निज  ठिंया  पहिचान  ले , पाये बर तैं  ठान ले।।

जबले मोबाइल आय हे , लइका मन बइहाय हे।
भुलगे हे  बाँटी भाँवरा , मोबाइल  मन  भाय हे।।

हवा हमर पानी हमर , जल जमीन जंगल हमर।
बउरो सुनता बाँध के , होही तब मंगल हमर।।

गदहा पागे राज अउ , फूलत हे बैशाख मा।
आगे जनता पर बिपत , चूहत आँसू आँख मा।।

बर्तन  चांदी  सोन के , पानी ठंडा ना करय।
करदे करसी काम वो , जेहर माटी ले बनय।।

हौंला  मा   पानी  भरे ,
               ऊँचा  बर्तन  जान  के।
पर जल ला ठंडा करे ,
              कुंभ कुम्हार दुकान के।।

चलय गरेरा झांझ ले , भँवरी मारत गांव मा।
ईटा के व्यापार बर , नमक लगावय घाव मा।।

ज्येष्ठ महीना के समय ,
               संसो छाये  माथ मा।
सरसर सरसर  लू चले ,
               हवा गरेरा  साथ मा।।

खच्चित मिलही सुख कभू ,
                  धीरज  धरले   दु:ख मा।
अँधरउ   के  आघू    टिके ,
                 फल लगथे उहि रूख मा।

अँधउर ला तुम जान लौ , यमराजा के काँवरा।
लेगे फूल ल तोड़ के , रोवत रहिगे भाँवरा।।

सीमा मा सैनिक डटे ,
            अउ किसान हा खेत मा।
रक्षक  दूनों  देश  के ,
            बसा  रखव   ये  चेत मा।।

खान पान कर संतुलित ,
                आहे  गरमी के  घरी।
अरबन चरबन छोड़ दे ,
              खाले फल सब्जी हरी।।

विरेन्द्र कुमार साहू

हिजगा करौ( गीत)

करौ  हिजगा  पढ़ाई  बर  निभाई  बर  गढ़ाई बर।

रहो सुनता सुमत ले जी छोड़ौ बिनता बिनाशी गा।
बनावौ घर ल मंदिर तुम तीरथ गंगा औ काशी गा।
जियौं  झन  गा  लड़ाई  कर चढ़ाई कर बुराई कर।
करौ  हिजगा  पढ़ाई  बर  लिखाई  बर  गढ़ाई बर।।

निभाले  तैं धरम खुद के करम करले अच्छाई के।
न कर लालच तैंहर भाई जगत मा निज बड़ाई के।
खड़े रहिबे तैं दमदम ले धरम रन  मा  लड़ाई  बर।
करौ  हिजगा  पढ़ाई  बर  लिखाई  बर  गढ़ाई बर।।

मया करले जनम भुँइया मिले शीतल जिहा छइया।
मया  कर गाँव  गंगा  ले  परौ  नित  पाँव के पँइया।
मया  माँ बाप  भाई बर  मया  बहिनी  औ बाई बर।
करौ  हिजगा  पढ़ाई   बर  लिखाई  बर  गढ़ाई बर।।

रचनाकार :
विरेन्द्र कुमार साहू
ग्राम : बोड़राबांधा(राजिम)
जिला : गरियाबंद(छत्तीसगढ़)
मो. 9993690899

मजदूर बर चार डाँड़

जेन मजदूर हवय उन  ला पता भी नइ हे,
कि आज विश्व मजदूर दिवस हे।
काबर ये माटी के मितान मनके किस्मत
छइहा मा बइठे मनखे के बस हे।।

तोर  ऊपर  कविता पढ़के  कई झन हा तरगे।
फेर तैहर  कइसे  भुख  अउ  प्यास  मा मरगे।
सबके महल तैं बनाए तोर बांटा झोपड़ी परगे।
सबला  सुख  देवइया  तोर  सुख  कहाँ  हरगे।।

तुमन  कवि  हौ  ता  करत हौ बढ़िया कविता।
हमला तो कहीं सोचन नी दे ये पेट एक बिता।
कहिबो ता होही हमरेच गा  सिरतोन  फधीता।
मेहनत  हमर रामायण हे  अउ आंसू हरे गीता।।

उल्लाला
श्रम के करथे आरती,जग मा जाँगर तोड़ के।
हिम्मत कर मजदूर हा , रख दिच नदियाँ मोड़ के।।

महल  अटारी  ला  बना , देथे  जे  सौगात मा।
बिते श्रमिक के जिंदगी , काबर कारी रात मा।।

मिहनत कर अँधियार मा,जग ला करे अँजोर गा।
त्यागी   गजब   महान  तैं,जै   जै  होवै   तोर गा।।

मैं मजदूर किसान हौं , मिहनत मोर मितान गा।
असल पसीना  गार के , लाहूँ  नवा  बिहान गा।।

कवि : विरेन्द्र कुमार साहू बोडराबांधा (राजिम)

छत्तीसगढ़ी दोहे

करव बिनय माँ सारदे , सुमिरव मय करजोर।
करदे  पूरा  आज  तय ,  मंजु   मनोरथ  मोर॥

बैसुरहा   सरनन   पड़े , दे  दे    मया   दुलार।
शारद  कंठ  बिराज के , सुर  ला  मोर  सँवार॥

लइका  हँव  निरबुद्धि मय , द्वार आयेव तोर।
माँगव मय मति मंजु हो  , अरजी सुनले  मोर॥

गठरी   भरगे  पाप  के , नाँव  फँसे  मझधार।
जिनगी  फँसगे  बिपत मा , सारद तिही उबार॥

जय गणेश जय गजवदन , गजानंद गजराज।
गौरी लाल महेश  प्रिय , करव सुमंगल  काज॥

बंदौं  शारद   सरसती , करबे   कृपा   अपार।
ब्रम्हकुमारी   ज्ञान  निधि , देबे  मया   दुलार॥

सारद   मइया   ज्ञान दे, आँखी  ला  झन मूंद।
मोरो  मुँह   मा  डार दे  , ज्ञानामृत  के     बूंद॥

कर्म  सार   संसार  मा , बाकी   सब   बेकार।
पाप-पुण्य ला सोच के , जिनगी अपन गुजार॥

पाप-पुण्य ला सोच के , जिनगी अपन गुजार।
कर्म  सार   संसार  मा , बाकी   सब   बेकार॥

जिनगी पानी फोटका , छिन भर मा फुट जाय।
जइसे   चंदा   चँदइनी , बेर  उवत  छिप जाय॥

जन्म मृत्यु अउ कर्म के , जिनगी तीन किताब।
जन्म मृत्यु बिधि हाथ मा , बाकी  तोर हिसाब॥

पेड़  साधु  अउ  संत  हे , काज  करे परमार्थ।
दान करे फल फूल ला , कभु नइ सोचे स्वार्थ॥

पेड़  पेड़  सब झन कहे , पेड़ न   मेड़  लगाय।
एक  पेड़  जो  दे लगा , कोटि  यज्ञ फल  पाय॥

पेड़   परम   पावन   कहे , पेड़ ह  पुत्र  समान।
करे   बड़ाई   उपनिषद , महिमा  पेड़   बखान॥

विश्व शांति  के  थापना , बर  बाधा  अउ दाग।
अइसन पाकिस्तान ला , अभी लगा दव आग॥

सत्ताईस  ज़िला  हवय , जनता   दुई     करोड़।
छत्तीसगढ़   बिकास   बर , आना   नत्ता  जोड़॥

नेता   बैठे खोल   के , स्वारथ    काज   दुकान।
संसो   हे  झन    बेच दे ,   एमन      हिन्दुस्तान॥

राजनीति   के  खेल मा , शिक्षित जनता आय।
लुटिया   डूबत    देख के , नेता  मन  पछताय॥

बेटी   बहिनी   जेन दिन , पाही   सच्चा  मान।
उही  समे   ले  देस  हा , बनही   गजब महान॥

करजा   माई   बाप  के , कइसे  मय  चुकाव।
जनम-जनम उबरौ नहीं , सीस चरन म  नवाव॥

कौड़ी  कौड़ी  जोड़ के ,  मंदिर ला  बनवाय।
कोन असल मा देवता , कभू समझ नइ पाय॥

करम करे के बेर मा ,  जस अपजस तय सोंच।
आँसू दुखिया लोग के , अपन   डहर  ले  पोंछ॥

गाँव   गली हर  ठौर  मा , खेत   खार  के  मेड़।
पर्यावरण   बचाय   बर , चलो    लगाबो   पेड़॥

भारत   भुँइया   में   छुपे , हे   कतनो   जयचंद।
घटना   घटना    देस मा , होय   कहाँ   ले   बंद॥

तीरथ   राज   प्रयाग   जस ,  हाबे  राजिम ग्राम।
तीन   नदी  के बीच  मा ,  बसे   कुलेश्वर   धाम॥

माघी पुन्नी आय जब , मेला  गजब  भराय।
माँ राजिम के गोद मा , साधु संत सकलाय॥

दुध   साधारण   हे  नहीं , देथे    जेला   गाय।
तन मन ला संबल करय , कतको रोग भगाय॥

गरब करे तैं देह के , जेकर मोल न भाव।
लगन लगाले राम से , बढ़ही तोर  प्रभाव॥

धूप छाँव कस जिंदगी , सुख-दुख के हे ठाँव।
धरम करम मा तन खपा , अमर बनाले  नाँव॥

कचरा प्लास्टिक हा करे , बंजर उसर जमीन।
खेत खार मा फेंक झन , झिल्ली   पालीथीन॥

कर निज भाषा ले मया , बोले बर झन लाज।
महतारी   भाषा   हमर , बन  जाही सरताज॥

पढ़बो लिखबो सब तभे , बनही   बिगड़े  काज।
शिक्षा  के  बढ़वार  ले , आही  गउकि    सुराज॥

दारू  पीकर  के बनों , बुद्धिमान  इंसान।
दुध ला पीना तो हरे , बइला के पहिचान॥

दारू  पीकर  के बनों , प्यारे   बुद्धिमान।
दुध ला पीना तो हरे , बइला के पहिचान॥

दुध   साधारण   है  नहीं , देथे  जेला    गाय।
तन मन ला संबल करे , घर मा खुशी समाय॥

साहब होगे लबरा अउ कानून हा होगे अंधवा।
नेता कइथे हमर का जही , रोजे कुकरी रँधवा।

डोंगा  कर नवकार के , नहकाही  भव  पार।
संसो अब का  बात के , गुरू  हवय  रखवार॥

डोंगा प्रभु ला सौंप दे , संसो फिकर ल छोड़।
राम नाम  भजते  रहो , दोनो  हाथ ल  जोड़॥

डोंगा  के  पतवार  ला , दे  कान्हा   के  हाथ।
बीच धार मा भक्त के , कभु नइ छोड़य साथ॥

घुरवा के बड़ फायदा , गोबर कचरा  फेंक।
जैविक खाद इँहे बने , उपजे फसल अनेंक॥

घुरवा मा बनथे महल , समय फिरे  के बाद।
आथे बेरा प्रभु  तभे , सबला   करथे    याद॥

गरुवा   घुरवा   राज के , बनही  अब  पहिचान।
करके   दोनों  के  जतन , होही  पोठ   किसान॥

पालय  सकल जहान ला , राखे सबके ध्यान।
तेखर  नाँव  किसान  हे , दुनिया  के भगवान॥

जयति जवान किसान जय,जग के तारनहार।
एक   पेट     रखवार   हे  , एक देश रखवार॥

चिला  फरा अउ  ठेठरी , खुरमी  बरा  सुहाय।
आये तीज तिहार जब , जुरमिल  सबे  बनाय॥

मूंग  दार  ला  पीस  के , हरदी    मिरचा  डार।
तेल  तले  के   बाद  मा , बरा   होय   तइयार॥

बेसन  पानी  घोर के , नमक  स्वाद  अनुसार।
मिर्चा  हरियर डार के  , कर  भजिया तइयार॥

आज के अभ्यास  *दही मही*

सबे जिनिस गौ मातु के , बड़ उपयोगी आय।
दही मही अउ घीव हा , सबला गजब सुहाय।।

तन चंगा ठंडा रही , लू के चलय न  जोर।
दही  मही  गरमी  घरी , खावौं   संगी   मोर।।

बड़  गुणकारी   हे  दही , संगी   देहू  ध्यान।
खाना मा थोरिक दही , खावव साँझ  बिहान।।

मखना कोचइ खेड़हा , कढ़ही  बरा  सुहाय।
बढ़े स्वाद लागे गजब , छौंका  मही  लगाय।।

कठिन परिश्रम संग मा , रखव  बात  के ध्यान।
मिलय नहीं बिन साधना , कला कुशलता ज्ञान।।

जउन जगह हाँसत दिखय , जम्मो बड़े सियान।
तउन  जगह  ला जान लौ , सुग्घर सरग समान।।

समझौ बेटी ला नहीं , निज फोरा या घाव।
गजब मान सम्मान ले , ओकर करौ बिहाव।।

पश्चिम संस्कृति मा अटक ,दुख के करे हियाव।
नइ  जाने  का   चीज  ये , हिन्दू  धरम  बिहाव।।

पश्चिम संस्कृति मा अटक ,झन होवौ गुमराह।
सात  जनम  के बंधना , हिन्दू  धरम  विवाह।।

अठरा  पुत्री  के  उमर , पुत्र  उमर  इक्कीस।
शादी  करौ  विचार  के , गुण  देखौ  छत्तीस।।

विषम समय में सम रहें , करें  लगन से  काम।
तो निश्चित मिलकर रहे,श्रम का शुभ परिणाम।।

लगन परिश्रम साधना , सतत मनन स्वाध्याय।
इनसे इच्छित  फल मिले , इसमें ना  दो  राय।।

कवि: विरेन्द्र कुमार साहू बोड़राबाँधा(राजिम)

आँसू पर दोहे


विषय : आँसू
विधा : दोहा छंद

मैं   हूँ   आँसू आँख का , मेरा   रंग  अनेक।
है  महत्व   मेरा  बड़ा , कहते   हैं    प्रत्येक।।

आते  आँसू  आँख में , लेकर   हर्ष  विषाद।
है  यह  मोती  कीमती , करना  मत बरबाद।।

आते माँ की आँख जो , बनकर प्रेम निशान।
आँसू  ममता   रूप   में , पाता  है   पहचान।।

आँसू को पहचानिए , दुख का  सच्चा मित्र।
यहाँ सभी  देते  दगा  , है  यह  बात विचित्र।।

घड़ियाली आँसू बहा , किया गलत है काम।
ऐसे  जन  ने  कर दिए  , आँसू को बदनाम।।

चिड़िया ही देखी नहीं , जिसकी ना हो पाँख।
बिन  आँसू  देखी नहीं , जग में  कोई  आँख।।

स्नेह  लुटाना  जानता , आँसू  दुखिया  संग।
गिरता  ज्यों बरसात  में , झरझर नीर  मतंग।।

रचनाकार :
नाम : विरेन्द्र कुमार साहू
पता : ग्राम-बोड़राबांधा(राजिम)
        जिला-गरियाबंद(छ.ग.)
मो. : 9993690899


बादल गुरुदेव के सम्मान मा


आदरणीय गुरुदेव चोवाराम बादल जी जन्मदिन के बधाई!

आपके बड़प्पन बर दू डाँड़:- दोहा

बड़का खुद ला कब कथे , मैं हा बड़का आँव।
फेर   सबो   झन   जानथे , पीपर   देथे  छाँव।।

रोला :- व्यक्तित्व पर चार डाँड़

बादल   चोवाराम , उड़ेला   गाँव   निवासी।
समझै उन साहित्य , अपन बर गंगा काशी।
बनके साधक  छंद , रचे  कविता कल्याणी।
सहज सरल हे व्यक्ति , बड़ा गुरतुर हे वाणी।।

मई माह इक्कीस , रहय दिन बादर बढ़िया।
देवसिंग घर आज , पहुँचगे  एक  नगरिया।
गोरस   धार  पियाय , सोन कुंवर महतारी।
खुशी  मनावय खास , उड़ेला के नर नारी।।

शुभकामना के शब्द :- उल्लाला

बनके बादल बरसत हवय ,
                जेन शिष्य कल्याण बर।
हे  परमेश्वर  करबे   कृपा ,
              अइसन व्यक्ति महान बर।।

बाधा  झन  आवै  कभू , जिनगी  के रफ्तार मा।
मिलय सबे शुभ चीज हा , तोला जी उपहार मा।।

कांटा  खूँटी  ले कभू  , होय  तोर  झन   सामना।
सदा सलामत प्रभु रखय , इही हमर शुभकामना।।

साधक : विरेन्द्र कुमार साहू

महतारी के मया छत्तीसगढ़ी उल्लाला छंद


शीर्षक : महतारी के मया
छंद : उल्लाला

दुनिया  मा अनमोल जी , हे  महतारी  के मया।
अपन खुशी ला पाट के , देथे सुत सुख के पया।

राखे नौ दस माह ले , सहिके जोखिम लाख जी।
पाथे   महतारी  तभे , सुख  के  सुग्घर पाख जी।।

माता के करनी घलो , दीपक ज्योति समान हे।
रौशन  कर  संतान ला , करथे काज  महान हे।।

मुरहा  ला   दे   जिंदगी , करथे   गा  उद्धार  हे।
जेकर  छाती  ले   बहे , पावन  अमरित धार हे।।

सच्चा जीवन दायिनी , माँ अमरित के खान हे।
कल्पवृक्ष के तुल्य अउ , कामद गाय समान हे।।

ममता  करुणा अउ कहाँ , पाबे  तैं   इंसान रे।
जूझ काल  के गाल माँ , तोर  बचाथे  जान रे।।

सदा  झुकावौ  शीश ला , महतारी  के मान मा।
जग जननी माँ ले बड़े , भगवन नहीं जहान मा।।

रचनाकार : विरेन्द्र कुमार साहू
ग्राम - बोडराबांधा(राजिम)
जिला : गरियाबंद (छत्तीसगढ़)
मो. 9993690899

छत्तीसगढ़ी दोहे

श्रम अउ फोकट पाय मा , बस अतकेच विभेद।
फोकट  पाय गँवाय  मा , थोरिक  होय  न खेद॥


जाँगर  तोड़ कमाय बर , झन तँय पाछू घूँच।
महिनत व्यर्थ कभू नहीं , मिलही पदवी ऊँच॥
महिनत बिरथा जाय नइ

श्रम  के फल  मीठा लगे , टपके   तन  ले  श्वेद।
फोकट  बाँट  सिराय मा , होथे   अब्बड़   खेद॥

भाजी  ला  जानव  सगा , सस्ता   अच्छा   साग।
मिलय विटामिन कैल्शियम , सुस्ती जावय भाग॥

अरपा  केलो   कोटरी , महानदी  शिवनाथ।
राज हमर सुख पात हे , मनियारी हे   साथ॥

माण्ड लात खारुन नदी , पैरी सबरी  जोंक।
लीलागर  इंद्रावती , रखय  काल  ला  रोक॥

ईब  बाघ  अउ  तांदुला , मारी अउ  हसदेव।
नदियां सुग्घर   रेणुका ,  दूध नदी  सुखदेव॥

राग  रंग मा  बूड़ के , भाव भजन झन भूल।
चार  पहर  के जिन्दगी , सेवा  जेकर   मूल॥

काम बुता ले भाग झन , मन कतको बोहाय।
रुपया  पइसा के  बिना , जिनगी नइ पोहाय॥

काम  बुता ले भाग झन , मन कहिथे इतराय।
जिनगी पइसा के बिना , फोकट जान पहाय॥

मेला राजिम  धाम के , भारी  भीड़  भराय।
आये संत सुजान मन , पबरित स्नान नहाय॥

महानदी  के  तीर  मा , बसे  हवय  ये धाम।
कमलनयन के वास हे , राजिम सुग्घर नाम॥

तीन  नदी  के  भेंट ले , संगम  नाव धराय।
माघी पुन्नी आय जब , मेला  गजब  भराय॥

दरसन करके देव के ,जिनगी सुफल बनाय।
महानदी के घाट मा , मेला जबर भराय।

मेला राजिम गाँव मा , माघ महिना भराय।
पुन्नी मेला नाव ले , जग  पहिचान  बनाय॥

तीरथ   राज   प्रयाग   जस ,  हाबे  राजिम ग्राम।
तीन   नदी  के बीच  मा ,  बसे   कुलेश्वर   धाम॥

माघी  पुन्नी  आय    जब , मेला   गजब   भराय।
माँ   राजिम   के   गोद  मा , साधु संत सकलाय॥

जबले आय हवय जियो , सरपट चलथे नेट।
वाटसेप  अउ  फेसबुक , बने   कराथे  भेंट॥

जइसे प्रकृति बसंत ले , पाये  मान   सहर्ष।
वइसे संस्कृति संत ले , पाथे शुभ   उत्कर्ष॥

लाली  परसा  फूल के , हरियर आमा  बौर।
शोभा सुखद बसंत के , दिखे कहीं ना और॥

जय शंकर जय पार्वती , जय हो लाल गणेश।
रक्षा  कर  परिवार  के , अरजी   हवै   महेश॥

परब   महाशिव रात्रि  हे ,  जपले   उमा    महेश।
पलभर में शिव काट ही , जिनगी के दुख क्लेश।।

गुरू बचन ला मान के , खोले भक्ति कपाट।
राम  दरस के आस मा ,  सबरी  जोहे  बाट॥
गुरुवर वाणी मान के

चांदी  के  घर द्वार  मा , सोना  जड़े कपाट।
रखवारी  दिन  बीत गे , कभु  नइ देखे हाट॥
देख न पाये हाट

छंद काव्य मा साधना , जेकर हे शुभ काम।
सेवा माटी के करिस , जनकवि कोदूराम॥

हितवा नारी कस नहीं , जग मा कोनो और।
मान दुठन कुल के रखे , करव यहूला  गौर॥

हितवा नारी कस नहीं, जग मा कोनो आन।
दू ठन कुल के जी रखय, वोहा सुग्घर मान।

नारी  के शुभ कोख ले , जनम  धरे  नर देव।
करय   सृष्टि  श्रृंगार  ला , नाँव  मान से लेव॥

गरजे जब्बर लोक धुन , पाँव कहां चुपचाप।
गरजे बाजा ताकधिन , कोन रहे चुपचाप।

राज हमर छत्तीसगढ़ , सबके अलग अलाप।
चंदन क्रियाकलाप॥
करमा धुन मा नाचले , गदकय माँदर थाप॥

पंथी करमा अउ सुआ , लोक नाच के रंग।
मजा  करे  छत्तीसगढ़ , संगी   साथी  संग॥

राउत  गेड़ी   डाँहकी , पंथी   डंडा  फाग।
नाचे  संगी   जँहुरिया , गाये  बीसों   राग॥

सुआ   ददरिया   भरथरी , बारहमासी  गीत।
लोकरंग  के  संग  मा , बाँटे  मया     पिरीत॥

मन मा उफलत भाव ला , रसिक बनाये गीत।
आनी   बानी   रंग   मा , बाँटे   मया   पिरीत॥

रसिक सुनाये हाल ला , बाँटे मया पिरीत॥
दुख पीरा अउ भावना , बाँटे जम्मों मीत॥

आनंद।
सुआ ददरिया भरथरी , लोक गीत देवार।
राज हमर छत्तीसगढ़ , रचे  बसे  भरमार॥

तरिया  नरवा  गाँव  बर , सिरतों  मा  वरदान।
जतन करव येकर घला , अपन  धरोहर जान॥

पेड़  लगाके  पार  मा , तरिया   ले  लव  आय।
मछरी पालन के घलो , कर सकथव व्यवसाय॥

तरिया  दे  बड़   फायदा , सेवा   करके   देख।
जल  मा  मछरी   पाल ले , मेड़ म  पेड़ सरेख॥

तरिया मछरी पाल लौ ,मिल के संगी चार।
पेड़ लगाके पार मा, फर ला बेंच बजार॥

खाई  बाढ़य  देश मा , हालत   बड़े   अजीब।
बड़हर मन बड़हर बने, , निर्धन बिकट गरीब॥

दुखदेवा   हे   जिंदगी , मनखे   अगर  गरीब।
निर्धन कोनो झन रहय , खोज करव तरकीब॥

भजिया गुझिया ठेठरी , बरा फरा   पकवान।
खुरमी सोहारी रांध के , मानव परब मितान॥

मया मिलन के शुभ घड़ी , होली के त्यौहार।
राँध  बरा  अउ   ठेठरी , बाँटव  संगी  प्यार॥

महिनत के रोटी मिलय , श्रम ले नत्ता  जोड़।
असल पसीना गार ले , आलस लालच छोड़॥

गाय गाँव गंगा जिहा , जिहा हरी के धाम।
करव नमन माँ भारती , गोद कृष्ण अउ राम॥

सुग्घर  सुखदायी सरग , हरय   हमर ये गाँव।
नित नियाव बासा करय , दया मया के ठाँव॥

सुमिरव हरी बिहान मा  छोड़ राग रस भोग।
चार बजे बिहना उठव , करलव कसरत योग।
उवत  बेर  दर्शन  करव , तन मन होय निरोग॥

उवत  बेर बिहना  कहय , सीखव संगी सीख।
जग ला  देना पुण्य हे ,माँगव  मत  तुम भीख॥

विरेन्द्र कुमार साहू