गुरु सिरतोन महान हे , धरती के भगवान हे।
बंदौं गुरु के पद कमल ,काटे जे सब भव प्रबल।।
गुरुवर तोर अराधना , मोरे जीवन साधना।
करहु कृपा मुझ दीन पर,सकल कला गुणहीन पर।।
बहुत बुरा हे माँगना , भला मरन स्वीकारना।
माथा ऊँचा राखना , लालच लंका त्यागना।।
झन खा पर के खीर ला , झन पी पर के नीर ला।
नाच नहीं पर हाथ मा , स्वाभिमान रख साथ मा।।
डरबे झन तैं हार ले , बुरा समय व्यवहार ले।
बाद हार के जीत हे , इही जगत के रीत हे।।
फल आशा त्यागो लखन,मिहनत कर होके मगन।
लगे फूल फल याद मा , बरसों बीते बाद मा।।
सबर करौ होके मगन , घुरुवा मा बनथे भवन।
बाद हार के जीत हे ,इही जगत के रीत हे।
कूड़ा कचरा ला धरे , काम नेक घुरुवा करे।
बदले जैविक खाद मा , करे मदद उत्पाद मा।।
तन ला घुरवा झन बना , नशा पान मा झन सना।
मानुष तन अनमोल हे , इही संत के बोल हे।।
सपना धरे सुराज के , उज्जर सुग्घर राज के।
जुरमिल भीड़व काज मा,सुनता रखौ समाज मा।।
जरगे सुनता राग मा , बैर भाव के आग मा।
छोड़ौ गरब गुमान ला , लानव नवा बिहान ला।।
सपना मा गाँधी बबा , गुस्सा ला मन मा दबा।
आइस मोरे पास मा , राम राज के आस मा।।
सपना ला सिरतोन कस , करही पूरा कोन जस।
मन मा मैं रहिथो गुनत , मुखिया के भाखा सुनत।।
नेता भुलगे निज धरम , करत हवय गंदा करम।
परथे डाँका लाज मा , अब का होही राज मा।।
सुग्घर सपना ठान लो , हाथ धनुष अउ बान लो।
कमर बाँध लो हे सखा , बैरी ला धुर्रा चखा।।
आलस जब करबे नहीं , सपना तब होही सहीं।
निज ठिंया पहिचान ले , पाये बर तैं ठान ले।।
जबले मोबाइल आय हे , लइका मन बइहाय हे।
भुलगे हे बाँटी भाँवरा , मोबाइल मन भाय हे।।
हवा हमर पानी हमर , जल जमीन जंगल हमर।
बउरो सुनता बाँध के , होही तब मंगल हमर।।
गदहा पागे राज अउ , फूलत हे बैशाख मा।
आगे जनता पर बिपत , चूहत आँसू आँख मा।।
बर्तन चांदी सोन के , पानी ठंडा ना करय।
करदे करसी काम वो , जेहर माटी ले बनय।।
हौंला मा पानी भरे ,
ऊँचा बर्तन जान के।
पर जल ला ठंडा करे ,
कुंभ कुम्हार दुकान के।।
चलय गरेरा झांझ ले , भँवरी मारत गांव मा।
ईटा के व्यापार बर , नमक लगावय घाव मा।।
ज्येष्ठ महीना के समय ,
संसो छाये माथ मा।
सरसर सरसर लू चले ,
हवा गरेरा साथ मा।।
खच्चित मिलही सुख कभू ,
धीरज धरले दु:ख मा।
अँधरउ के आघू टिके ,
फल लगथे उहि रूख मा।
अँधउर ला तुम जान लौ , यमराजा के काँवरा।
लेगे फूल ल तोड़ के , रोवत रहिगे भाँवरा।।
सीमा मा सैनिक डटे ,
अउ किसान हा खेत मा।
रक्षक दूनों देश के ,
बसा रखव ये चेत मा।।
खान पान कर संतुलित ,
आहे गरमी के घरी।
अरबन चरबन छोड़ दे ,
खाले फल सब्जी हरी।।
विरेन्द्र कुमार साहू
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