Thursday, 27 June 2019

प्रवीर के दोहे हिन्दी

निंदा :-

कहता  सच  हूँ माँ  कसम , निंदा है  बेकार।
पता  चले यदि  बाद में , बढ़  जाये  तकरार॥

निंदा कभी न कीजिए , जो खुद से लघु होय।
छोटा तिनका भूल से  , आँख  लगे दुख होय॥

आँखों  से आंसू बहा , दिल ने बोला  आह।
तब कविता होगी बनी , कहा सभी ने वाह॥
ऋतुओं पर :-

आया  ऋतु   बसंत  का , फूले  फूल  पलास।
बूंद ओस की  खो गई , मधुर  मधुर  आभास॥

कविता :-

कवि की कविता आग है , जले  शत्रु   लंगोट।
लाठी बनकर  अक्ल पर , करदे  गहरी   चोट॥

पुलवामा घटना पर दोहे:-

भारत  भू  के  भाग  में , जीवित  हैं  जयचंद।
नहीं  अंत  आतंक  का , होय  न  घटना  बंद॥

करिए  पहला  काम  यह , खोजो  तुम गद्दार।
पकड़ पकड़ कर मार दो , जितने  हैं मक्कार॥

कब - तक  भारत  वर्ष  ये , झेलेगा   आतंक।
उचित समय पर  काट दो , उनके  सारे  अंक॥

कुत्ते की दुम पाक का , अगर  यही  आगाज़।
सर्वनाश  नापाक  हो  , भारत   की  आवाज़॥

नहीं  संधि  ना  बात हो , चाह  नहीं  है शांति।
इंकलाब   आगाज़  हो , गुंजे  घर-घर  क्रांति॥

यदि सीना छप्पन इंच का , मारो शेर दहाड़।
करदो  एक  प्रहार में  , दुश्मन को दो फाड़॥

बैरी  के इस  काम पर , मानस में भर  क्रोध।
जस को तस ही दीजिए , याद रहे  प्रतिशोध॥

चिंता :-

चिंता करना ना कभी , जीवन  में  इंसान।
चिंता चंचल चित करे , चिंता मृत्यु समान॥

आर्य :-

जीना मरना  देश पर , है  वंदनीय    कार्य।
मातृभूमि पर  जान दे , कहलाये वह आर्य॥
रहे सदा स्वीकार्य॥

दौर बुरा यदि चल रहा , मन में रख  विश्वास।
अपनी छवि भी ना दिखें , दर्पण ना हो पास॥

दारू समर्थक (हास्य)

दारू  पीकर  तुम बनो , प्यारे सुबुद्धिमान।
दुध को पीते  ही नहीं , समझदार   इंसान॥
दुध को पीना है भला , बैल बुध्दि पहचान॥

गौधन समर्थक (गंभीर)

दुध  साधारण  है नहीं , देती  जो माँ गाय।
तन मन को संबल करे , और बढ़ाते आय॥

दारू   कभी   न   पीजिए , पीना   है  बेकार।
तन मन धन का नाश हो , बिखरे घर परिवार॥

लोकतंत्र

जनता की  सहभागिता , लोकतंत्र  की  नींव।
जागरूकता  के बिना , समझ  इसे   निर्जीव॥

निंदा :-

कहता  सच  हूँ माँ  कसम , निंदा है  बेकार।
पता  चले यदि  बाद में , बढ़  जाये  तकरार॥

निंदा कभी न कीजिए , जो खुद से लघु होय।
छोटा तिनका भूल से  , आँख  लगे दुख होय॥

आँखों  से आंसू बहा , दिल ने बोला  आह।
तब कविता होगी बनी , कहा सभी ने वाह॥
ऋतुओं पर :-

आया  ऋतु   बसंत  का , फूले  फूल  पलास।
बूंद ओस की  खो गई , मधुर  मधुर  आभास॥

कविता :-

कवि की कविता आग है , जले  शत्रु   लंगोट।
लाठी बनकर  अक्ल पर , करदे  गहरी   चोट॥

पुलवामा घटना पर दोहे:-

भारत  भू  के  भाग  में , जीवित  हैं  जयचंद।
नहीं  अंत  आतंक  का , होय  न  घटना  बंद॥

करिए  पहला  काम  यह , खोजो  तुम गद्दार।
पकड़ पकड़ कर मार दो , जितने  हैं मक्कार॥

कब - तक  भारत  वर्ष  ये , झेलेगा   आतंक।
उचित समय पर  काट दो , उनके  सारे  अंक॥

कुत्ते की दुम पाक का , अगर  यही  आगाज़।
सर्वनाश  नापाक  हो  , भारत   की  आवाज़॥

नहीं  संधि  ना  बात हो , चाह  नहीं  है शांति।
इंकलाब   आगाज़  हो , गुंजे  घर-घर  क्रांति॥

यदि सीना छप्पन इंच का , मारो शेर दहाड़।
करदो  एक  प्रहार में  , दुश्मन को दो फाड़॥

बैरी  के इस  काम पर , मानस में भर  क्रोध।
जस को तस ही दीजिए , याद रहे  प्रतिशोध॥

चिंता :-

चिंता करना ना कभी , जीवन  में  इंसान।
चिंता चंचल चित करे , चिंता मृत्यु समान॥

आर्य :-

जीना मरना  देश पर , है  वंदनीय    कार्य।
मातृभूमि पर  जान दे , कहलाये वह आर्य॥
रहे सदा स्वीकार्य॥

दौर बुरा यदि चल रहा , मन में रख  विश्वास।
अपनी छवि भी ना दिखें , दर्पण ना हो पास॥

दारू समर्थक (हास्य)

दारू  पीकर  तुम बनो , प्यारे सुबुद्धिमान।
दुध को पीते  ही नहीं , समझदार   इंसान॥
दुध को पीना है भला , बैल बुध्दि पहचान॥

गौधन समर्थक (गंभीर)

दुध  साधारण  है नहीं , देती  जो माँ गाय।
तन मन को संबल करे , और बढ़ाते आय॥

दारू   कभी   न   पीजिए , पीना   है  बेकार।
तन मन धन का नाश हो , बिखरे घर परिवार॥

लोकतंत्र

जनता की  सहभागिता , लोकतंत्र  की  नींव।
जागरूकता  के बिना , समझ  इसे   निर्जीव॥

लालच डर भय रोग है, अनपढ़ता अभिशाप।
अपने  मत को  बेचना , बहुत  बड़ा है   पाप॥

लोकतंत्र  के  पर्व  में , सभी    बटाएं    हाथ।
सुंदर  शासन  के  लिए , चलों  निभाएं साथ॥

चिंता करना ना कभी , जीवन में   इंसान।
चिंता चित चंचल करे , चिंता मृत्यु समान॥

सुबह सुबह का टहलना , फलदायी  भरपूर।
पुलकित साधक जन रहे , आलस भागे दूर॥

गुरू मिले सौभाग्य से , हरि सम है नवकार।
अर्पित तन मन को करें , होंगे भव  से  पार॥

ज़िना वतन ही के लिए  , पुजा योग्य है कार्य।
मातृभूमि सम कुछ नहीं , कहे कहलाये आर्य॥

जबसे आया है जियो , सरपट चलते नेंट।
वाटसेप या फेसबुक , पर  होती  है  भेंट॥

अलख जगाने देश में , बन जाऊँ शुभ काव्य।
जागृत करूँ समाज को , हो  मेरा   सौभाग्य॥

विरेन्द्र कुमार साहू बोडराबांधा राजिम

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