निंदा :-
कहता सच हूँ माँ कसम , निंदा है बेकार।
पता चले यदि बाद में , बढ़ जाये तकरार॥
निंदा कभी न कीजिए , जो खुद से लघु होय।
छोटा तिनका भूल से , आँख लगे दुख होय॥
आँखों से आंसू बहा , दिल ने बोला आह।
तब कविता होगी बनी , कहा सभी ने वाह॥
ऋतुओं पर :-
आया ऋतु बसंत का , फूले फूल पलास।
बूंद ओस की खो गई , मधुर मधुर आभास॥
कविता :-
कवि की कविता आग है , जले शत्रु लंगोट।
लाठी बनकर अक्ल पर , करदे गहरी चोट॥
पुलवामा घटना पर दोहे:-
भारत भू के भाग में , जीवित हैं जयचंद।
नहीं अंत आतंक का , होय न घटना बंद॥
करिए पहला काम यह , खोजो तुम गद्दार।
पकड़ पकड़ कर मार दो , जितने हैं मक्कार॥
कब - तक भारत वर्ष ये , झेलेगा आतंक।
उचित समय पर काट दो , उनके सारे अंक॥
कुत्ते की दुम पाक का , अगर यही आगाज़।
सर्वनाश नापाक हो , भारत की आवाज़॥
नहीं संधि ना बात हो , चाह नहीं है शांति।
इंकलाब आगाज़ हो , गुंजे घर-घर क्रांति॥
यदि सीना छप्पन इंच का , मारो शेर दहाड़।
करदो एक प्रहार में , दुश्मन को दो फाड़॥
बैरी के इस काम पर , मानस में भर क्रोध।
जस को तस ही दीजिए , याद रहे प्रतिशोध॥
चिंता :-
चिंता करना ना कभी , जीवन में इंसान।
चिंता चंचल चित करे , चिंता मृत्यु समान॥
आर्य :-
जीना मरना देश पर , है वंदनीय कार्य।
मातृभूमि पर जान दे , कहलाये वह आर्य॥
रहे सदा स्वीकार्य॥
दौर बुरा यदि चल रहा , मन में रख विश्वास।
अपनी छवि भी ना दिखें , दर्पण ना हो पास॥
दारू समर्थक (हास्य)
दारू पीकर तुम बनो , प्यारे सुबुद्धिमान।
दुध को पीते ही नहीं , समझदार इंसान॥
दुध को पीना है भला , बैल बुध्दि पहचान॥
गौधन समर्थक (गंभीर)
दुध साधारण है नहीं , देती जो माँ गाय।
तन मन को संबल करे , और बढ़ाते आय॥
दारू कभी न पीजिए , पीना है बेकार।
तन मन धन का नाश हो , बिखरे घर परिवार॥
लोकतंत्र
जनता की सहभागिता , लोकतंत्र की नींव।
जागरूकता के बिना , समझ इसे निर्जीव॥
निंदा :-
कहता सच हूँ माँ कसम , निंदा है बेकार।
पता चले यदि बाद में , बढ़ जाये तकरार॥
निंदा कभी न कीजिए , जो खुद से लघु होय।
छोटा तिनका भूल से , आँख लगे दुख होय॥
आँखों से आंसू बहा , दिल ने बोला आह।
तब कविता होगी बनी , कहा सभी ने वाह॥
ऋतुओं पर :-
आया ऋतु बसंत का , फूले फूल पलास।
बूंद ओस की खो गई , मधुर मधुर आभास॥
कविता :-
कवि की कविता आग है , जले शत्रु लंगोट।
लाठी बनकर अक्ल पर , करदे गहरी चोट॥
पुलवामा घटना पर दोहे:-
भारत भू के भाग में , जीवित हैं जयचंद।
नहीं अंत आतंक का , होय न घटना बंद॥
करिए पहला काम यह , खोजो तुम गद्दार।
पकड़ पकड़ कर मार दो , जितने हैं मक्कार॥
कब - तक भारत वर्ष ये , झेलेगा आतंक।
उचित समय पर काट दो , उनके सारे अंक॥
कुत्ते की दुम पाक का , अगर यही आगाज़।
सर्वनाश नापाक हो , भारत की आवाज़॥
नहीं संधि ना बात हो , चाह नहीं है शांति।
इंकलाब आगाज़ हो , गुंजे घर-घर क्रांति॥
यदि सीना छप्पन इंच का , मारो शेर दहाड़।
करदो एक प्रहार में , दुश्मन को दो फाड़॥
बैरी के इस काम पर , मानस में भर क्रोध।
जस को तस ही दीजिए , याद रहे प्रतिशोध॥
चिंता :-
चिंता करना ना कभी , जीवन में इंसान।
चिंता चंचल चित करे , चिंता मृत्यु समान॥
आर्य :-
जीना मरना देश पर , है वंदनीय कार्य।
मातृभूमि पर जान दे , कहलाये वह आर्य॥
रहे सदा स्वीकार्य॥
दौर बुरा यदि चल रहा , मन में रख विश्वास।
अपनी छवि भी ना दिखें , दर्पण ना हो पास॥
दारू समर्थक (हास्य)
दारू पीकर तुम बनो , प्यारे सुबुद्धिमान।
दुध को पीते ही नहीं , समझदार इंसान॥
दुध को पीना है भला , बैल बुध्दि पहचान॥
गौधन समर्थक (गंभीर)
दुध साधारण है नहीं , देती जो माँ गाय।
तन मन को संबल करे , और बढ़ाते आय॥
दारू कभी न पीजिए , पीना है बेकार।
तन मन धन का नाश हो , बिखरे घर परिवार॥
लोकतंत्र
जनता की सहभागिता , लोकतंत्र की नींव।
जागरूकता के बिना , समझ इसे निर्जीव॥
लालच डर भय रोग है, अनपढ़ता अभिशाप।
अपने मत को बेचना , बहुत बड़ा है पाप॥
लोकतंत्र के पर्व में , सभी बटाएं हाथ।
सुंदर शासन के लिए , चलों निभाएं साथ॥
चिंता करना ना कभी , जीवन में इंसान।
चिंता चित चंचल करे , चिंता मृत्यु समान॥
सुबह सुबह का टहलना , फलदायी भरपूर।
पुलकित साधक जन रहे , आलस भागे दूर॥
गुरू मिले सौभाग्य से , हरि सम है नवकार।
अर्पित तन मन को करें , होंगे भव से पार॥
ज़िना वतन ही के लिए , पुजा योग्य है कार्य।
मातृभूमि सम कुछ नहीं , कहे कहलाये आर्य॥
जबसे आया है जियो , सरपट चलते नेंट।
वाटसेप या फेसबुक , पर होती है भेंट॥
अलख जगाने देश में , बन जाऊँ शुभ काव्य।
जागृत करूँ समाज को , हो मेरा सौभाग्य॥
विरेन्द्र कुमार साहू बोडराबांधा राजिम
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