आज के विषय "उमस" मा सरसी छंद
बढ़गे हावे नंगत गरमी ,
कुहरत हावे घात।
कठला देहे पवन देवता ,
तात-तात दिन - रात।।
आँखी-आँखी चँउधा गेहे ,
धमकत हावे माथ।
बिकट उमस मा तरसत हावों,
नइहे धीरज साथ।।
खउलत हावे धरती दाई ,
उड़त चाय अस भाप।
जम्मों प्रानी भोगत हावे ,
जबर करे कस पाप।।
बाप बरोबर गरमी ऋतु के ,
लागत हे आषाढ़।
बितगे पाख तभो ले अभ्भो ,
आये नइहे बाढ़।।
दुख के पाछू सुख हा मिलथे ,
विधि के इही विधान।
घरी उमस के जब कट जाही ,
आही जाड़ मितान।।
छंदकार :-
विरेन्द्र कुमार साहू
ग्राम - बोडराबांधा (पाण्डुका)
वि.स. - राजिम जिला -गरियाबंद
छत्तीसगढ़ , मो. 9993690899
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