पतरेंगी अस छोकरी , आये रोज बजार।
अंतस ओला देख के , गाये गीत हजार।।
डर के मारे नइ कहँव , अपन हृदय के बात।
तभो समझ वो जाय जी , मोर सबे जज्बात।।
तूमा भाँटा ले सजे , पसरा लागे नीक।
घेरी बेरी प्यार ले , बात करय सब ठीक।।
आवत जावत कहि परौं,का राखे हस हीर।
वोहर कहि दे हाँव ले , आई लभ यू वीर।।
बड़ लजकुरहा आँव मैं , लागय मोला लाज।
बाजय गदकड़ गद तभो , एक सार के साज।।
मिर्चा भाटा संग मा , लेवौं रोज पताल।
बइठौ पसरा मेर ता , अपन बतावय हाल।।
भरगे पीरा मूड़ मा , करम फाटगे मोर।
सब्जी वाली छोकरी , कहिस हरौ मैं तोर।।
विरेन्द्र कुमार साहू
No comments:
Post a Comment