Thursday, 27 June 2019

विविध दोहे छत्तीसगढ़ी

भय अउ भ्रष्टाचार के , लमियावय झन नार।
मैं चाहत  हौं  देश मा , बनय  ठोस  सरकार॥  

मैं चाहत हौं काव्य मा , रहय एक संदेश।
ठकुरसुहाती बंद हो , हो  जन पीड़ा पेश॥

बिजली पानी अउ सड़क , होय गाँव के पास।
मैं  चाहत  हौं  गाँव  के , सुग्घर होय विकास॥

मैं   चाहत    हौं  देश    ले ,  भागे भ्रष्टाचार॥

सत्ता के उपचार बर , बन  गिस  भीम  हकीम।
लोकतंत्र ला दृढ़ करिस , सब बोलो जय भीम॥

पंखा कूलर हे चलत , घर मा दिन अउ रात।
गरमी ले राहत नहीं , ये संसो के बात॥

करम  करे  के  टेम  मा , सोये   चादर  तान।
बिरथा मानुष तन गवाँ , पहुँच गेस शमशान॥

बेर बुलक गे तोर तब , होगे मरे बिहान।
जाँगर खँग गे तोर तब , करबे काय सियान।।

योगा करव बिहान मा , रहिहौ सदा निरोग।
तन मन धन सब बाँचही , सुग्घर जिनगी भोग॥

रसना मीठा होय ले , बने मितान अनेक।
बिनता बिगड़े बोल ला , बाहिर कोती फेक।।

मत के दान सबे करव , होय सबल गणतंत्र।
स्वच्छ सुदृढ़ सरकार बर , येला जानव मंत्र॥

याद रखव मतदान हा , आय पुण्य के काम।
अइसन अवसर लाभ ला , झन कर लेके दाम॥

मेरा अभिमत काव्य में , रहे  एक  संदेश।
ठकुरसुहाती  बंद हो , हो  जन-पीड़ा पेश॥

बिजली पानी अउ सड़क , होय गाँव के तीर।
मैं चाहत हौं गाँव के , बदलय जी तकदीर॥

फाँफा फुदकय नार जब , धनहा डोली खेत।
फसल बचाये  बर बबा , रहिहौ  तुमन सचेत॥

हरियर भुरवा रंग मा , फाँफा मिलय अनेंक।
बारी  बखरी  झन घुसे , उनकर रसता छेंक॥
(फाँफा शब्द के प्रयोग बस होय हे)
बड़ जीपरहा कोकड़ा , फाँफा बिन-बिन खाय।
लालच फाँफा खाय के , जाला मा फँस  जाय॥

खून पसीना जब बहे , झूमय  नाचय  खार।
माटी ला   सोना  करय , मेहनती   बनिहार॥

पाही मान जहान मा , जब बनिहार किसान।
तभ्भे तो  सिरतोन मा , आही  नवा  बिहान॥

विरेन्द्र कुमार साहू बोडराबांधा राजिम

रतिहा के बाँचे भात मा , डारव पानी थोर।
नून डार ले स्वाद बर , बासी खाव चिभोर।।

राजनीति सफियाय बर , जनता लेवय भार।
जनसेवक ला चून  के , पहिनावय जी  हार॥

कलम चलाबो देश बर , लिखबो जन के बात।
अलख जगाबो गाँव मा , भूल जात अउ पात॥

नशा नाश के जड़ हरे , जिनगी करय खराब।
बाँचव येकर ले सदा , पीयव नहीं शराब॥

यमुना काटे पाप ला , हरय सकल अज्ञान।
जाके ओखर घाट मा , करलो संगी स्नान॥

राजनीति सफियाय बर , जनता लेवय भार।
जनसेवक ला चून  के , पहिनावय जी  हार॥

सरग बरोबर सुख मिले , मन मा  छाये  मोद।
सब सुख फीका सामने , हो जब माँ के गोद॥

महुआ रस मा मात के , कर डारे तन नाश।
तन ला अपन बिगाड़ के , फँसगे यम के पाश॥

महूँ अभागा हँव भिड़े , मन मा लेके आस।
गुरुवर कृपा प्रताप ले , बनहूँ कवि मैं खास॥

छंदकार :-
                विरेन्द्र कुमार साहू
        ग्राम  - बोडराबांधा (पाण्डुका)
       वि.स. - राजिम जिला -गरियाबंद
       छत्तीसगढ़ , मो. 9993690899
             

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