सौंहत के भगवान , ददा दाई ला जानौ।
सेवौ साँझ बिहान , बात अउ उनखर मानौ।
देथे जीवन दान , पियाके दूध ल दाई।
पालन करके बाप , हरे जम्मों करलाई।
मिलथे मनवा मान ले , सेवा के परिणाम हा।
मातु पिता आशीष ले , बनथे बिगड़े काम हा।।
चलो लगाबो पेड़ , राज ला हरियर करबो।
सुग्घर सुखद भविष्य , चमाचम उज्जर करबो।
खेत खार के मेड़ , बाँध अउ ताल तलैया।
औषधि अउ फलदार , लगाबो पेड़ ल भैया।
बन जाही जब रूख तब,देही फल अउ छाँव गा।
रही राज खुशहाल अउ,हरियर दिखही गाँव गा।।
अपनावौ जी योग , निरोगी रइही काया।
सुग्घर जिनगी भोग , छोड़के आलस माया।
तन-मन चंगा होय , योग ले जानौ भइया।
जिनगी सुख आधार , इही ला मानौ भइया।
तन के करलेवौ जतन , थोरिक सोच बिचार के।
अपन भविष्य सँवार लौ,योग बियाम ल धार के।।
पर्यावरण बँचाव , पेड़ पौधा ला रोपौ।
हरियर कलगी खास , धरा के मूड़ म खोपौ।
दुनिया के सब जीव , रहय जी सुख से घर मा।
छूटे झन आवास , बिनाशी ठौर शहर मा।
धरती के सिंगार अउ , करौ जीव उपकार जी।
सुख खातिर सब जीव के,हरियर रख संसार जी।।
काँटा-खूँटी बीन , लेस सब झिटका कचरा।
खेत-खार चतवार , बना ले सुग्घर पसरा।
आगे बतर किसान , पोंछ आँखी के चिपरा।
मेड़ मुँही .ला बाँध , जाँच ले डबरा डिपरा।
गोबर खातू डार के , माटी के उपचार कर।
जैविक खेती मा फसल ,उत्पादन भरमार कर।।
झिल्ली हाबे श्राप , धरा ला करथे बंजर।
दानव एला जान , धरे जस खतरा खंजर।
खा डारे कहुँ गाय , रोग हो जावै भारी।
मरे बिना अपराध , छोड़ के पिला बिचारी।
घातक झिल्ली जीव बर , बैरी येहर प्रान के।
बंद करौ उपयोग ला,खतरनाक बड़ मान के।।
बिजहा छाँट निमार , धान के पोक्खा दाना।
करले कुछ उपचार , प्रमाणित दवा मिलाना।
जवाफूल दुबराज , सारथी साम्भा सरना।
एच एम टी क्रांति , बाँसमति भोग अपरना।
किसम किसम के धान , मोटा अउ पतला हवय।
अबड़ अकन हे धान , सारथी साम्भा सरना।
निज पसंद अनुसार , खेत मा बोंये करना।
नंगत पैदावार , अगर लेना हे भाई।
करौ बीज उपचार , डार के उचित दवाई।
पोषण खातिर खातू दवा,समय-समय मा देव जी।
बों के उपचारित बीजहा , उत्पादन बड़ लेव जी।।
विरेन्द्र कुमार साहू
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