Thursday, 27 June 2019

छत्तीसगढ़ी छप्पय छंद


सौंहत  के  भगवान , ददा   दाई   ला  जानौ।
सेवौ  साँझ  बिहान , बात अउ उनखर मानौ।
देथे  जीवन   दान , पियाके    दूध  ल    दाई।
पालन  करके   बाप , हरे    जम्मों   करलाई।
मिलथे मनवा मान ले , सेवा के  परिणाम हा।
मातु पिता आशीष ले , बनथे बिगड़े काम हा।।

चलो   लगाबो   पेड़ , राज  ला  हरियर  करबो।
सुग्घर  सुखद भविष्य , चमाचम उज्जर करबो।
खेत  खार   के  मेड़ , बाँध  अउ   ताल  तलैया।
औषधि  अउ  फलदार , लगाबो  पेड़  ल  भैया।
बन जाही जब रूख तब,देही फल अउ छाँव गा।
रही राज खुशहाल अउ,हरियर दिखही गाँव गा।।

अपनावौ    जी    योग , निरोगी   रइही  काया।
सुग्घर  जिनगी  भोग , छोड़के  आलस   माया।
तन-मन  चंगा  होय , योग   ले   जानौ   भइया।
जिनगी सुख  आधार , इही  ला   मानौ  भइया।
तन के करलेवौ जतन , थोरिक सोच बिचार के।
अपन भविष्य सँवार लौ,योग बियाम ल धार के।।

पर्यावरण    बँचाव , पेड़    पौधा     ला    रोपौ।
हरियर  कलगी  खास , धरा  के  मूड़ म  खोपौ।
दुनिया के  सब जीव , रहय जी  सुख से घर मा।
छूटे  झन   आवास , बिनाशी   ठौर    शहर  मा।
धरती  के  सिंगार अउ , करौ जीव  उपकार जी।
सुख खातिर सब जीव के,हरियर रख संसार जी।।

काँटा-खूँटी   बीन , लेस सब  झिटका  कचरा।
खेत-खार   चतवार , बना   ले   सुग्घर  पसरा।
आगे बतर  किसान , पोंछ  आँखी  के चिपरा।
मेड़  मुँही  .ला  बाँध , जाँच ले  डबरा  डिपरा।
गोबर  खातू  डार  के , माटी  के  उपचार कर।
जैविक खेती मा फसल ,उत्पादन भरमार कर।।

झिल्ली  हाबे  श्राप , धरा  ला  करथे  बंजर।
दानव  एला  जान , धरे  जस  खतरा खंजर।
खा डारे  कहुँ  गाय , रोग   हो   जावै  भारी।
मरे  बिना  अपराध , छोड़  के पिला बिचारी।
घातक झिल्ली जीव बर , बैरी  येहर प्रान के।
बंद करौ उपयोग ला,खतरनाक बड़ मान के।।

बिजहा छाँट निमार , धान के पोक्खा दाना।
करले कुछ उपचार , प्रमाणित दवा मिलाना।
जवाफूल दुबराज , सारथी साम्भा सरना।
एच एम टी क्रांति , बाँसमति भोग अपरना।
किसम किसम के धान , मोटा अउ पतला हवय।

अबड़ अकन  हे धान  , सारथी   साम्भा   सरना।
निज   पसंद   अनुसार , खेत   मा  बोंये   करना।
नंगत      पैदावार , अगर      लेना       हे    भाई।
करौ  बीज   उपचार , डार   के   उचित     दवाई।
पोषण खातिर खातू दवा,समय-समय मा देव जी।
बों के उपचारित  बीजहा , उत्पादन  बड़ लेव जी।।

विरेन्द्र कुमार साहू

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