करव बिनय माँ सारदे , सुमिरव मय करजोर।
करदे पूरा आज तय , मंजु मनोरथ मोर॥
बैसुरहा सरनन पड़े , दे दे मया दुलार।
शारद कंठ बिराज के , सुर ला मोर सँवार॥
लइका हँव निरबुद्धि मय , द्वार आयेव तोर।
माँगव मय मति मंजु हो , अरजी सुनले मोर॥
गठरी भरगे पाप के , नाँव फँसे मझधार।
जिनगी फँसगे बिपत मा , सारद तिही उबार॥
जय गणेश जय गजवदन , गजानंद गजराज।
गौरी लाल महेश प्रिय , करव सुमंगल काज॥
बंदौं शारद सरसती , करबे कृपा अपार।
ब्रम्हकुमारी ज्ञान निधि , देबे मया दुलार॥
सारद मइया ज्ञान दे, आँखी ला झन मूंद।
मोरो मुँह मा डार दे , ज्ञानामृत के बूंद॥
कर्म सार संसार मा , बाकी सब बेकार।
पाप-पुण्य ला सोच के , जिनगी अपन गुजार॥
पाप-पुण्य ला सोच के , जिनगी अपन गुजार।
कर्म सार संसार मा , बाकी सब बेकार॥
जिनगी पानी फोटका , छिन भर मा फुट जाय।
जइसे चंदा चँदइनी , बेर उवत छिप जाय॥
जन्म मृत्यु अउ कर्म के , जिनगी तीन किताब।
जन्म मृत्यु बिधि हाथ मा , बाकी तोर हिसाब॥
पेड़ साधु अउ संत हे , काज करे परमार्थ।
दान करे फल फूल ला , कभु नइ सोचे स्वार्थ॥
पेड़ पेड़ सब झन कहे , पेड़ न मेड़ लगाय।
एक पेड़ जो दे लगा , कोटि यज्ञ फल पाय॥
पेड़ परम पावन कहे , पेड़ ह पुत्र समान।
करे बड़ाई उपनिषद , महिमा पेड़ बखान॥
विश्व शांति के थापना , बर बाधा अउ दाग।
अइसन पाकिस्तान ला , अभी लगा दव आग॥
सत्ताईस ज़िला हवय , जनता दुई करोड़।
छत्तीसगढ़ बिकास बर , आना नत्ता जोड़॥
नेता बैठे खोल के , स्वारथ काज दुकान।
संसो हे झन बेच दे , एमन हिन्दुस्तान॥
राजनीति के खेल मा , शिक्षित जनता आय।
लुटिया डूबत देख के , नेता मन पछताय॥
बेटी बहिनी जेन दिन , पाही सच्चा मान।
उही समे ले देस हा , बनही गजब महान॥
करजा माई बाप के , कइसे मय चुकाव।
जनम-जनम उबरौ नहीं , सीस चरन म नवाव॥
कौड़ी कौड़ी जोड़ के , मंदिर ला बनवाय।
कोन असल मा देवता , कभू समझ नइ पाय॥
करम करे के बेर मा , जस अपजस तय सोंच।
आँसू दुखिया लोग के , अपन डहर ले पोंछ॥
गाँव गली हर ठौर मा , खेत खार के मेड़।
पर्यावरण बचाय बर , चलो लगाबो पेड़॥
भारत भुँइया में छुपे , हे कतनो जयचंद।
घटना घटना देस मा , होय कहाँ ले बंद॥
तीरथ राज प्रयाग जस , हाबे राजिम ग्राम।
तीन नदी के बीच मा , बसे कुलेश्वर धाम॥
माघी पुन्नी आय जब , मेला गजब भराय।
माँ राजिम के गोद मा , साधु संत सकलाय॥
दुध साधारण हे नहीं , देथे जेला गाय।
तन मन ला संबल करय , कतको रोग भगाय॥
गरब करे तैं देह के , जेकर मोल न भाव।
लगन लगाले राम से , बढ़ही तोर प्रभाव॥
धूप छाँव कस जिंदगी , सुख-दुख के हे ठाँव।
धरम करम मा तन खपा , अमर बनाले नाँव॥
कचरा प्लास्टिक हा करे , बंजर उसर जमीन।
खेत खार मा फेंक झन , झिल्ली पालीथीन॥
कर निज भाषा ले मया , बोले बर झन लाज।
महतारी भाषा हमर , बन जाही सरताज॥
पढ़बो लिखबो सब तभे , बनही बिगड़े काज।
शिक्षा के बढ़वार ले , आही गउकि सुराज॥
दारू पीकर के बनों , बुद्धिमान इंसान।
दुध ला पीना तो हरे , बइला के पहिचान॥
दारू पीकर के बनों , प्यारे बुद्धिमान।
दुध ला पीना तो हरे , बइला के पहिचान॥
दुध साधारण है नहीं , देथे जेला गाय।
तन मन ला संबल करे , घर मा खुशी समाय॥
साहब होगे लबरा अउ कानून हा होगे अंधवा।
नेता कइथे हमर का जही , रोजे कुकरी रँधवा।
डोंगा कर नवकार के , नहकाही भव पार।
संसो अब का बात के , गुरू हवय रखवार॥
डोंगा प्रभु ला सौंप दे , संसो फिकर ल छोड़।
राम नाम भजते रहो , दोनो हाथ ल जोड़॥
डोंगा के पतवार ला , दे कान्हा के हाथ।
बीच धार मा भक्त के , कभु नइ छोड़य साथ॥
घुरवा के बड़ फायदा , गोबर कचरा फेंक।
जैविक खाद इँहे बने , उपजे फसल अनेंक॥
घुरवा मा बनथे महल , समय फिरे के बाद।
आथे बेरा प्रभु तभे , सबला करथे याद॥
गरुवा घुरवा राज के , बनही अब पहिचान।
करके दोनों के जतन , होही पोठ किसान॥
पालय सकल जहान ला , राखे सबके ध्यान।
तेखर नाँव किसान हे , दुनिया के भगवान॥
जयति जवान किसान जय,जग के तारनहार।
एक पेट रखवार हे , एक देश रखवार॥
चिला फरा अउ ठेठरी , खुरमी बरा सुहाय।
आये तीज तिहार जब , जुरमिल सबे बनाय॥
मूंग दार ला पीस के , हरदी मिरचा डार।
तेल तले के बाद मा , बरा होय तइयार॥
बेसन पानी घोर के , नमक स्वाद अनुसार।
मिर्चा हरियर डार के , कर भजिया तइयार॥
आज के अभ्यास *दही मही*
सबे जिनिस गौ मातु के , बड़ उपयोगी आय।
दही मही अउ घीव हा , सबला गजब सुहाय।।
तन चंगा ठंडा रही , लू के चलय न जोर।
दही मही गरमी घरी , खावौं संगी मोर।।
बड़ गुणकारी हे दही , संगी देहू ध्यान।
खाना मा थोरिक दही , खावव साँझ बिहान।।
मखना कोचइ खेड़हा , कढ़ही बरा सुहाय।
बढ़े स्वाद लागे गजब , छौंका मही लगाय।।
कठिन परिश्रम संग मा , रखव बात के ध्यान।
मिलय नहीं बिन साधना , कला कुशलता ज्ञान।।
जउन जगह हाँसत दिखय , जम्मो बड़े सियान।
तउन जगह ला जान लौ , सुग्घर सरग समान।।
समझौ बेटी ला नहीं , निज फोरा या घाव।
गजब मान सम्मान ले , ओकर करौ बिहाव।।
पश्चिम संस्कृति मा अटक ,दुख के करे हियाव।
नइ जाने का चीज ये , हिन्दू धरम बिहाव।।
पश्चिम संस्कृति मा अटक ,झन होवौ गुमराह।
सात जनम के बंधना , हिन्दू धरम विवाह।।
अठरा पुत्री के उमर , पुत्र उमर इक्कीस।
शादी करौ विचार के , गुण देखौ छत्तीस।।
विषम समय में सम रहें , करें लगन से काम।
तो निश्चित मिलकर रहे,श्रम का शुभ परिणाम।।
लगन परिश्रम साधना , सतत मनन स्वाध्याय।
इनसे इच्छित फल मिले , इसमें ना दो राय।।
कवि: विरेन्द्र कुमार साहू बोड़राबाँधा(राजिम)
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