Thursday, 27 June 2019

छत्तीसगढ़ी दोहे

करव बिनय माँ सारदे , सुमिरव मय करजोर।
करदे  पूरा  आज  तय ,  मंजु   मनोरथ  मोर॥

बैसुरहा   सरनन   पड़े , दे  दे    मया   दुलार।
शारद  कंठ  बिराज के , सुर  ला  मोर  सँवार॥

लइका  हँव  निरबुद्धि मय , द्वार आयेव तोर।
माँगव मय मति मंजु हो  , अरजी सुनले  मोर॥

गठरी   भरगे  पाप  के , नाँव  फँसे  मझधार।
जिनगी  फँसगे  बिपत मा , सारद तिही उबार॥

जय गणेश जय गजवदन , गजानंद गजराज।
गौरी लाल महेश  प्रिय , करव सुमंगल  काज॥

बंदौं  शारद   सरसती , करबे   कृपा   अपार।
ब्रम्हकुमारी   ज्ञान  निधि , देबे  मया   दुलार॥

सारद   मइया   ज्ञान दे, आँखी  ला  झन मूंद।
मोरो  मुँह   मा  डार दे  , ज्ञानामृत  के     बूंद॥

कर्म  सार   संसार  मा , बाकी   सब   बेकार।
पाप-पुण्य ला सोच के , जिनगी अपन गुजार॥

पाप-पुण्य ला सोच के , जिनगी अपन गुजार।
कर्म  सार   संसार  मा , बाकी   सब   बेकार॥

जिनगी पानी फोटका , छिन भर मा फुट जाय।
जइसे   चंदा   चँदइनी , बेर  उवत  छिप जाय॥

जन्म मृत्यु अउ कर्म के , जिनगी तीन किताब।
जन्म मृत्यु बिधि हाथ मा , बाकी  तोर हिसाब॥

पेड़  साधु  अउ  संत  हे , काज  करे परमार्थ।
दान करे फल फूल ला , कभु नइ सोचे स्वार्थ॥

पेड़  पेड़  सब झन कहे , पेड़ न   मेड़  लगाय।
एक  पेड़  जो  दे लगा , कोटि  यज्ञ फल  पाय॥

पेड़   परम   पावन   कहे , पेड़ ह  पुत्र  समान।
करे   बड़ाई   उपनिषद , महिमा  पेड़   बखान॥

विश्व शांति  के  थापना , बर  बाधा  अउ दाग।
अइसन पाकिस्तान ला , अभी लगा दव आग॥

सत्ताईस  ज़िला  हवय , जनता   दुई     करोड़।
छत्तीसगढ़   बिकास   बर , आना   नत्ता  जोड़॥

नेता   बैठे खोल   के , स्वारथ    काज   दुकान।
संसो   हे  झन    बेच दे ,   एमन      हिन्दुस्तान॥

राजनीति   के  खेल मा , शिक्षित जनता आय।
लुटिया   डूबत    देख के , नेता  मन  पछताय॥

बेटी   बहिनी   जेन दिन , पाही   सच्चा  मान।
उही  समे   ले  देस  हा , बनही   गजब महान॥

करजा   माई   बाप  के , कइसे  मय  चुकाव।
जनम-जनम उबरौ नहीं , सीस चरन म  नवाव॥

कौड़ी  कौड़ी  जोड़ के ,  मंदिर ला  बनवाय।
कोन असल मा देवता , कभू समझ नइ पाय॥

करम करे के बेर मा ,  जस अपजस तय सोंच।
आँसू दुखिया लोग के , अपन   डहर  ले  पोंछ॥

गाँव   गली हर  ठौर  मा , खेत   खार  के  मेड़।
पर्यावरण   बचाय   बर , चलो    लगाबो   पेड़॥

भारत   भुँइया   में   छुपे , हे   कतनो   जयचंद।
घटना   घटना    देस मा , होय   कहाँ   ले   बंद॥

तीरथ   राज   प्रयाग   जस ,  हाबे  राजिम ग्राम।
तीन   नदी  के बीच  मा ,  बसे   कुलेश्वर   धाम॥

माघी पुन्नी आय जब , मेला  गजब  भराय।
माँ राजिम के गोद मा , साधु संत सकलाय॥

दुध   साधारण   हे  नहीं , देथे    जेला   गाय।
तन मन ला संबल करय , कतको रोग भगाय॥

गरब करे तैं देह के , जेकर मोल न भाव।
लगन लगाले राम से , बढ़ही तोर  प्रभाव॥

धूप छाँव कस जिंदगी , सुख-दुख के हे ठाँव।
धरम करम मा तन खपा , अमर बनाले  नाँव॥

कचरा प्लास्टिक हा करे , बंजर उसर जमीन।
खेत खार मा फेंक झन , झिल्ली   पालीथीन॥

कर निज भाषा ले मया , बोले बर झन लाज।
महतारी   भाषा   हमर , बन  जाही सरताज॥

पढ़बो लिखबो सब तभे , बनही   बिगड़े  काज।
शिक्षा  के  बढ़वार  ले , आही  गउकि    सुराज॥

दारू  पीकर  के बनों , बुद्धिमान  इंसान।
दुध ला पीना तो हरे , बइला के पहिचान॥

दारू  पीकर  के बनों , प्यारे   बुद्धिमान।
दुध ला पीना तो हरे , बइला के पहिचान॥

दुध   साधारण   है  नहीं , देथे  जेला    गाय।
तन मन ला संबल करे , घर मा खुशी समाय॥

साहब होगे लबरा अउ कानून हा होगे अंधवा।
नेता कइथे हमर का जही , रोजे कुकरी रँधवा।

डोंगा  कर नवकार के , नहकाही  भव  पार।
संसो अब का  बात के , गुरू  हवय  रखवार॥

डोंगा प्रभु ला सौंप दे , संसो फिकर ल छोड़।
राम नाम  भजते  रहो , दोनो  हाथ ल  जोड़॥

डोंगा  के  पतवार  ला , दे  कान्हा   के  हाथ।
बीच धार मा भक्त के , कभु नइ छोड़य साथ॥

घुरवा के बड़ फायदा , गोबर कचरा  फेंक।
जैविक खाद इँहे बने , उपजे फसल अनेंक॥

घुरवा मा बनथे महल , समय फिरे  के बाद।
आथे बेरा प्रभु  तभे , सबला   करथे    याद॥

गरुवा   घुरवा   राज के , बनही  अब  पहिचान।
करके   दोनों  के  जतन , होही  पोठ   किसान॥

पालय  सकल जहान ला , राखे सबके ध्यान।
तेखर  नाँव  किसान  हे , दुनिया  के भगवान॥

जयति जवान किसान जय,जग के तारनहार।
एक   पेट     रखवार   हे  , एक देश रखवार॥

चिला  फरा अउ  ठेठरी , खुरमी  बरा  सुहाय।
आये तीज तिहार जब , जुरमिल  सबे  बनाय॥

मूंग  दार  ला  पीस  के , हरदी    मिरचा  डार।
तेल  तले  के   बाद  मा , बरा   होय   तइयार॥

बेसन  पानी  घोर के , नमक  स्वाद  अनुसार।
मिर्चा  हरियर डार के  , कर  भजिया तइयार॥

आज के अभ्यास  *दही मही*

सबे जिनिस गौ मातु के , बड़ उपयोगी आय।
दही मही अउ घीव हा , सबला गजब सुहाय।।

तन चंगा ठंडा रही , लू के चलय न  जोर।
दही  मही  गरमी  घरी , खावौं   संगी   मोर।।

बड़  गुणकारी   हे  दही , संगी   देहू  ध्यान।
खाना मा थोरिक दही , खावव साँझ  बिहान।।

मखना कोचइ खेड़हा , कढ़ही  बरा  सुहाय।
बढ़े स्वाद लागे गजब , छौंका  मही  लगाय।।

कठिन परिश्रम संग मा , रखव  बात  के ध्यान।
मिलय नहीं बिन साधना , कला कुशलता ज्ञान।।

जउन जगह हाँसत दिखय , जम्मो बड़े सियान।
तउन  जगह  ला जान लौ , सुग्घर सरग समान।।

समझौ बेटी ला नहीं , निज फोरा या घाव।
गजब मान सम्मान ले , ओकर करौ बिहाव।।

पश्चिम संस्कृति मा अटक ,दुख के करे हियाव।
नइ  जाने  का   चीज  ये , हिन्दू  धरम  बिहाव।।

पश्चिम संस्कृति मा अटक ,झन होवौ गुमराह।
सात  जनम  के बंधना , हिन्दू  धरम  विवाह।।

अठरा  पुत्री  के  उमर , पुत्र  उमर  इक्कीस।
शादी  करौ  विचार  के , गुण  देखौ  छत्तीस।।

विषम समय में सम रहें , करें  लगन से  काम।
तो निश्चित मिलकर रहे,श्रम का शुभ परिणाम।।

लगन परिश्रम साधना , सतत मनन स्वाध्याय।
इनसे इच्छित  फल मिले , इसमें ना  दो  राय।।

कवि: विरेन्द्र कुमार साहू बोड़राबाँधा(राजिम)

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