सत्ता जनता बीच , एक ठन हावय नाता।
जइसे हे संबंध , चना के सँग मा जाँता।
जाँता के दू पाट , समझ ले नेता अफसर।
जनता चना समान , पिसावय पाटा भीतर।।
दरके दार पिसान , बनावय बूढ़ी माता।
तइहा मील मशीन , नँदागे ढेकी जाँता।
दाइ माइ सकलाय , बचावय घर के खर्चा।
आनी बानी गोठ , गाँव के होवय चर्चा।।
आशा रख भरपूर , काम हा पूरा होही।
सदा जीत उपहार , तोर किस्मत मा होही।
बीते बात बिसार , समय के घुमही चक्का।
चलव सत्य के राह , जीत होही जी पक्का।।
जनता के आदेश , अपन अंतस मा धरिहौ।
हार मिले या जीत , सदा तुम स्वागत करिहौ।
बात सोच लौ एक , पराजय हो जब भारी।
मन मा रख विश्वास , करव फिरसे तैयारी।।
माँ के मया अपार , पार नइ पावै कोई।
देव दनुज नर नाग , सबे झन चाहे जोई।
माँ के मया अपार , दयानिधि बड़ उपकारी।
गावै वेद पुराण , मातु के महिमा भारी।
गाँव गली अउ खोर , होय जब कूड़ा कचरा।
मच्छर करथे राज , बनाके ओला पसरा।
मलेरिया के रोग , चिन्हे नइ नोनी बाबू।
साफ रखव घर द्वार , तभे ये होही काबू।।
करिया होगे चाम , जेठ के तिपनी भारी।
गुस्सा गेहे घाम , तरत हे आरी-पारी।
दुखदेवा हे ताप , जीव ला कोन उबारे।
झेलत कष्ट अपार , मरत हाबे बिन मारे।।
सँगी लगा लव पेड़ , धरा के ये रखवाला।
दीही नंगत छाँव , घाम के कर मुँह काला।
भोजन पाके खास ,जीव मन करही बासा।
दीही जी आशीष , पुरोही मनके आसा।।
मानुष मूरख जेन , गुरू ला कहिथे दूसर।
अइसन मन के पीठ , चला दौ दमदम मूसर।
कभू मिलय जी दुःख , कभू खुशियाँ बड़भारी।
जीवन के आनंद , बताथे मौसम चारी।।
मिल जाही दिन एक , तोर तन हर माटी मा।
करले पुण्य अनेक , कमाले जस थाती मा।
नइ जावय कुछु साथ , मरे के बेरा मनवा।
बिधि के इही बिधान , बनत हस काबर कनवा।।
शबरी जोहे बाट , राम हा आही कहिके।
बाँधे मन मा आस , दुःख अउ पीरा सहिके।
करे जतन वो रोज , प्रेम से डगर बुहारे।
नाचे गाये गीत , राम आ राम पुकारे।।
जीना हे खुशहाल , सुनो जी राम कहानी।
सब ग्रंथन के झोर , संत तुलसी के बानी।
देथे सुग्घर ज्ञान , बिपत मा गजब पँदोली।
रामायण साहित्य , माथ के चंदन रोली।।
सदा बढ़े जी प्रेम , निभे सुग्घर जिनगानी।
कोठी छलके अन्न , बढ़े जस पूरा पानी।
कृपा करे भगवान , दुःख के पलटे पासा।
सुखी रहय परिवार , तोर ओ दीदी आशा।।
विरेन्द्र कुमार साहू बोडराबांधा राजिम
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