पानी हे ता प्रान हे , कइथे सब विद्वान।
जल जमीन जंगल बचा , जागौ चतुर सुजान।
जागौ चतुर सुजान , करौ झन झगड़ा दंगल।
बिन इनखर लौ मान , होय नइ कखरो मंगल।
सुनौ वीर के गोठ , छोड़ दौ जी मनमानी।
अपन भविष्य सँवार , बचालौ सबझन पानी।।
बेटी बेटा मा कभू , झन करिहौ जी भेद।
बेटा सुख संदेश ता , बेटी पुण्य नवेद।
बेटी पुण्य नवेद , ग्रंथ रामायण गीता।
दशरथ जनक गुमान , सती सावित्री सीता।
मान वीर के बात , सजा लौ किस्मत पेटी।
सदा करौ सम्मान , दुलौरिन दुहिता बेटी।।
भाई कस हितवा
हँसना जिनगी मा सदा , झन रहि कभू उदास।
हाँसत-हाँसत जे जिये , पाये धन-पद खास।
पाये धन पद खास , होय जग मान बड़ाई।
फल आशा ला त्याग , लगन से करौ कमाई।
मान वीर के बात , लोभ मा झन तो फँसना।
गाँठ बाँध ले गोठ , हमेशा मुचमुच हँसना।।
गरमी मा सब जीवमन , होगे हे हलकान।
सोचत हाबे ये दरी , निकल जही का जान।
निकल जही का जान ,बदन हा भभकत हाबे।
लाहो ले अस घाम , चाम हा झझकत हाबे।
भावत नइहे आम , सुहावत नइहे दरमी।
चित्त पड़े हे वीर , जानलेवा हे गरमी।।
बासी चटनी गोंदली , अउ बरबट्टी साग।
झड़कत हावौं खेत मा , सुनत ददरिया राग।
सुनत ददरिया राग ,मया मा झूमत हावौं।
लहरावत हे धान , बाल ला चूमत हावौं।
नाम हवय गा वीर , हरौं मैं भारत वासी।
दही नून ला डार , गजब के खाथौं बासी।।
छत मा पानी राख दे , आथे चिरई चींव।
देही वो आशीष ला , अपन जुड़ाके जीव।
अपन जुड़ाके जीव , गीत ला बढ़िया गाही।
नरियाके घर द्वार , बालमन ला बहलाही।
कर सेवा उपकार , कमाके पुण्य जगत मा।
चिरई मन बर वीर , राख दे पानी छत मा।।
खातू
गोबर खातू डार के , माटी ला कर पोठ।
उपज बाड़ही दू गुना , सिरतो पतिया गोठ।
सिरतो पतिया गोठ , खेत मा चमके खेती।
फसल रही विषहीन , मान ले तेखर सेती।
कहे वीर कविराय , किसानी होही आगर।
लहराही धन धान , डार ले खातू गोबर।।
पैरा ला लेसौ नहीं , खेत खार मा आज।
दुखदेवा हे जीव बर , गिरे प्रदूषण गाज।
गिरे प्रदूषण गाज , होय सब बर करलाई।
पर्यावरण बचाव , सुमत ले जम्मो भाई।
सुनौ सियानी गोठ , अपन झन चेथी ठेसौ।
तुरते जावौ चेत , नहीं पैरा ला लेसौ।।
पहुना
बेटी पहुना बन जथे , जब बिहाव हा होय।
मन मा नोनी सोच के , कलप कलप के रोय।
कलप कलप के रोय , दुःख के आँसू भारी।
कहे जनम का देय , विधाता अबला नारी।
सुख के दे भंडार , भरौ खुशियाँ ले पेटी।
करौ मान सम्मान , होय जब पहुना बेटी।।
आज नँदागे गाँव मा , खेल पताड़ी मार।
भँवरा बाँटी के घलो , कोन्हों नहीं चिन्हार।
कोन्हों नहीं चिन्हार , भुलागे आज जमाना।
आघू होही काय , नहीं अब हवय ठिकाना।
कहे वीर कविराय , लोग सब गजब छँदागे।
हमर राज के खेल , सबे हर आज नँदागे।।
पानी हे ता प्रान हे , कइथे सब विद्वान।
जल जमीन जंगल बचा , जागौ चतुर सुजान।
जागौ चतुर सुजान , करौ झन झगड़ा दंगल।
बिन इनखर लौ मान , होय नइ कखरो मंगल।
सुनौ वीर के गोठ , छोड़ दौ जी मनमानी।
अपन भविष्य सँवार , बचालौ सबझन पानी।।
बेटी बेटा मा कभू , झन करिहौ जी भेद।
बेटा सुख संदेश ता , बेटी पुण्य नवेद।
बेटी पुण्य नवेद , ग्रंथ रामायण गीता।
दशरथ जनक गुमान , सती सावित्री सीता।
मान वीर के बात , सजा लौ किस्मत पेटी।
सदा करौ सम्मान , दुलौरिन दुहिता बेटी।।
भाई कस हितवा
हँसना जिनगी मा सदा , झन रहि कभू उदास।
हाँसत-हाँसत जे जिये , पाये धन-पद खास।
पाये धन पद खास , होय जग मान बड़ाई।
फल आशा ला त्याग , लगन से करौ कमाई।
मान वीर के बात , लोभ मा झन तो फँसना।
गाँठ बाँध ले गोठ , हमेशा मुचमुच हँसना।।
गरमी मा सब जीवमन , होगे हे हलकान।
सोचत हाबे ये दरी , निकल जही का जान।
निकल जही का जान ,बदन हा भभकत हाबे।
लाहो ले अस घाम , चाम हा झझकत हाबे।
भावत नइहे आम , सुहावत नइहे दरमी।
चित्त पड़े हे वीर , जानलेवा हे गरमी।।
बासी चटनी गोंदली , अउ बरबट्टी साग।
झड़कत हावौं खेत मा , सुनत ददरिया राग।
सुनत ददरिया राग ,मया मा झूमत हावौं।
लहरावत हे धान , बाल ला चूमत हावौं।
नाम हवय गा वीर , हरौं मैं भारत वासी।
दही नून ला डार , गजब के खाथौं बासी।।
छत मा पानी राख दे , आथे चिरई चींव।
देही वो आशीष ला , अपन जुड़ाके जीव।
अपन जुड़ाके जीव , गीत ला बढ़िया गाही।
नरियाके घर द्वार , बालमन ला बहलाही।
कर सेवा उपकार , कमाके पुण्य जगत मा।
चिरई मन बर वीर , राख दे पानी छत मा।।
साधक : विरेन्द्र कुमार साहू
साधक : विरेन्द्र कुमार साहू
No comments:
Post a Comment