मन विषय पर दोहे
मन बनता है मतलबी , खुद के बारे सोच।
स्वारथ की ही सोचना , मानवता पर मोच।।
लाभ हानि को सोचकर , मन ना करो अधीर।
मौसम के अनुकूल पर , बादल बरषे नीर।।
मन तो चंचल है बहुत , समझे ना उपदेश।
पल-पल बदले राह को , देख-देख परिवेश।।
बदन मलिन स्वीकार है , दिखे भले ही भूत।
मनः मलिन बेकार है , दानव सा करतूत।।
तन का हारा जीत ले , कभी कभी मैदान।
लेकिन मन हारा मनुज , बनते नहीं महान।।
छंदकार :-
विरेन्द्र कुमार साहू
ग्राम - बोडराबांधा (पाण्डुका)
वि.स. - राजिम जिला -गरियाबंद
छत्तीसगढ़ , मो. 9993690899
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