*अंडा के अभिलाषा*
चाह नहीं बन जावौं चीला
खावै जम्मो माई पीला।
चाह नहीं मैं भूंजी बनके
मनला भावौं दरुहा मनके।।
मोर एक अभिलाषा हे जी
फोड़ कुनेता मनके भेजी।
अंडा जीवन ला धन्य करौं
चाहे मैं मौत जघन्य मरौं।।
रचना : विरेन्द्र कुमार साहू
ग्राम : बोडराबांधा(राजिम)
मो. 9993690899
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