श्रम अउ फोकट पाय मा , बस अतकेच विभेद।
फोकट पाय गँवाय मा , थोरिक होय न खेद॥
जाँगर तोड़ कमाय बर , झन तँय पाछू घूँच।
महिनत व्यर्थ कभू नहीं , मिलही पदवी ऊँच॥
महिनत बिरथा जाय नइ
श्रम के फल मीठा लगे , टपके तन ले श्वेद।
फोकट बाँट सिराय मा , होथे अब्बड़ खेद॥
भाजी ला जानव सगा , सस्ता अच्छा साग।
मिलय विटामिन कैल्शियम , सुस्ती जावय भाग॥
अरपा केलो कोटरी , महानदी शिवनाथ।
राज हमर सुख पात हे , मनियारी हे साथ॥
माण्ड लात खारुन नदी , पैरी सबरी जोंक।
लीलागर इंद्रावती , रखय काल ला रोक॥
ईब बाघ अउ तांदुला , मारी अउ हसदेव।
नदियां सुग्घर रेणुका , दूध नदी सुखदेव॥
राग रंग मा बूड़ के , भाव भजन झन भूल।
चार पहर के जिन्दगी , सेवा जेकर मूल॥
काम बुता ले भाग झन , मन कतको बोहाय।
रुपया पइसा के बिना , जिनगी नइ पोहाय॥
काम बुता ले भाग झन , मन कहिथे इतराय।
जिनगी पइसा के बिना , फोकट जान पहाय॥
मेला राजिम धाम के , भारी भीड़ भराय।
आये संत सुजान मन , पबरित स्नान नहाय॥
महानदी के तीर मा , बसे हवय ये धाम।
कमलनयन के वास हे , राजिम सुग्घर नाम॥
तीन नदी के भेंट ले , संगम नाव धराय।
माघी पुन्नी आय जब , मेला गजब भराय॥
दरसन करके देव के ,जिनगी सुफल बनाय।
महानदी के घाट मा , मेला जबर भराय।
मेला राजिम गाँव मा , माघ महिना भराय।
पुन्नी मेला नाव ले , जग पहिचान बनाय॥
तीरथ राज प्रयाग जस , हाबे राजिम ग्राम।
तीन नदी के बीच मा , बसे कुलेश्वर धाम॥
माघी पुन्नी आय जब , मेला गजब भराय।
माँ राजिम के गोद मा , साधु संत सकलाय॥
जबले आय हवय जियो , सरपट चलथे नेट।
वाटसेप अउ फेसबुक , बने कराथे भेंट॥
जइसे प्रकृति बसंत ले , पाये मान सहर्ष।
वइसे संस्कृति संत ले , पाथे शुभ उत्कर्ष॥
लाली परसा फूल के , हरियर आमा बौर।
शोभा सुखद बसंत के , दिखे कहीं ना और॥
जय शंकर जय पार्वती , जय हो लाल गणेश।
रक्षा कर परिवार के , अरजी हवै महेश॥
परब महाशिव रात्रि हे , जपले उमा महेश।
पलभर में शिव काट ही , जिनगी के दुख क्लेश।।
गुरू बचन ला मान के , खोले भक्ति कपाट।
राम दरस के आस मा , सबरी जोहे बाट॥
गुरुवर वाणी मान के
चांदी के घर द्वार मा , सोना जड़े कपाट।
रखवारी दिन बीत गे , कभु नइ देखे हाट॥
देख न पाये हाट
छंद काव्य मा साधना , जेकर हे शुभ काम।
सेवा माटी के करिस , जनकवि कोदूराम॥
हितवा नारी कस नहीं , जग मा कोनो और।
मान दुठन कुल के रखे , करव यहूला गौर॥
हितवा नारी कस नहीं, जग मा कोनो आन।
दू ठन कुल के जी रखय, वोहा सुग्घर मान।
नारी के शुभ कोख ले , जनम धरे नर देव।
करय सृष्टि श्रृंगार ला , नाँव मान से लेव॥
गरजे जब्बर लोक धुन , पाँव कहां चुपचाप।
गरजे बाजा ताकधिन , कोन रहे चुपचाप।
राज हमर छत्तीसगढ़ , सबके अलग अलाप।
चंदन क्रियाकलाप॥
करमा धुन मा नाचले , गदकय माँदर थाप॥
पंथी करमा अउ सुआ , लोक नाच के रंग।
मजा करे छत्तीसगढ़ , संगी साथी संग॥
राउत गेड़ी डाँहकी , पंथी डंडा फाग।
नाचे संगी जँहुरिया , गाये बीसों राग॥
सुआ ददरिया भरथरी , बारहमासी गीत।
लोकरंग के संग मा , बाँटे मया पिरीत॥
मन मा उफलत भाव ला , रसिक बनाये गीत।
आनी बानी रंग मा , बाँटे मया पिरीत॥
रसिक सुनाये हाल ला , बाँटे मया पिरीत॥
दुख पीरा अउ भावना , बाँटे जम्मों मीत॥
आनंद।
सुआ ददरिया भरथरी , लोक गीत देवार।
राज हमर छत्तीसगढ़ , रचे बसे भरमार॥
तरिया नरवा गाँव बर , सिरतों मा वरदान।
जतन करव येकर घला , अपन धरोहर जान॥
पेड़ लगाके पार मा , तरिया ले लव आय।
मछरी पालन के घलो , कर सकथव व्यवसाय॥
तरिया दे बड़ फायदा , सेवा करके देख।
जल मा मछरी पाल ले , मेड़ म पेड़ सरेख॥
तरिया मछरी पाल लौ ,मिल के संगी चार।
पेड़ लगाके पार मा, फर ला बेंच बजार॥
खाई बाढ़य देश मा , हालत बड़े अजीब।
बड़हर मन बड़हर बने, , निर्धन बिकट गरीब॥
दुखदेवा हे जिंदगी , मनखे अगर गरीब।
निर्धन कोनो झन रहय , खोज करव तरकीब॥
भजिया गुझिया ठेठरी , बरा फरा पकवान।
खुरमी सोहारी रांध के , मानव परब मितान॥
मया मिलन के शुभ घड़ी , होली के त्यौहार।
राँध बरा अउ ठेठरी , बाँटव संगी प्यार॥
महिनत के रोटी मिलय , श्रम ले नत्ता जोड़।
असल पसीना गार ले , आलस लालच छोड़॥
गाय गाँव गंगा जिहा , जिहा हरी के धाम।
करव नमन माँ भारती , गोद कृष्ण अउ राम॥
सुग्घर सुखदायी सरग , हरय हमर ये गाँव।
नित नियाव बासा करय , दया मया के ठाँव॥
सुमिरव हरी बिहान मा छोड़ राग रस भोग।
चार बजे बिहना उठव , करलव कसरत योग।
उवत बेर दर्शन करव , तन मन होय निरोग॥
उवत बेर बिहना कहय , सीखव संगी सीख।
जग ला देना पुण्य हे ,माँगव मत तुम भीख॥
विरेन्द्र कुमार साहू
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