Thursday, 27 June 2019

छंदकार सम्मेलन बर प्रोटोकॉल

अरुण निगम गुरुदेव के , हौं मैं शिष्य नदान।
छंद काव्य के कवि बनौं , सपना मोर महान।।

साहू लक्ष्मण  दाउ के , अँव   मैंहा  संतान।
दाई  नाव  भुनेश्वरी , सउहँत शक्ति समान॥
२.
निच्चट अड़हा मैं हवौं , हौं  हासी के  केंद्र।
रहिथौं राजिम क्षेत्र मा , हावय नाव  विरेंद्र॥
३.
तेल  पेरना  आय  जी , हम तेली  सो काम।
जाँगर कनिहा तोड़ के , लेथन वाजिब दाम॥
४.
सेवा  हे   संस्कार  बर , देथौं    शिक्षा  ज्ञान।
शिक्षक कवि के रूप मा,हवय मोर पहिचान॥
५.
करिया हाबे तन  भले , मन  के हावौं साफ।
गलती यदि कुछ हो जही,करहू मोला माफ॥

आत्मा के सौंदर्य का , शब्द रूप है काव्य।
मानव होना भाग्य है , कवि होना सौभाग्य।।

ददा नीम के पेड़ जस , कड़वा जड़ फल पान।
देवय शीतल  छाँव अउ , दवा  रोग  बर  जान॥

ददा   रहे    ले  सब   रहे , होवय   पूरा   शौंक।
हो कतनो गलती तभो, कुकुर सकय नइ भौंक॥

ददा बनो दशरथ सरिस , सुत बर स्वारथ त्याग।
तुमन  अपन संतान बर , छोड़व   दारू   भाँग॥

ददा - कृपा  ले  सब  मिले , केरा  आमा   सेव।
इनकर  जीयत ले अपन ,  शौक  पूर्ण कर लेव॥

सुत  अमीर  बनगे  भले , पर   पैसा   बर  रोय।
ददा  गरीब  कमाय  जब ,शौक  पूर्ण  तब होय॥

सुखी  ददा  दाई रखय , जब  बेटा  निज  पास।
देवय  तब   ही  देवता , धन  वैभव  पद खास॥

दाई  ददा   ल   मानबो  ,  जब   देवी   भगवान।
तभे  यकीनन  बन  जही , हर घर  सरग समान॥

गुरु  सिरतोन   महान  हे , धरती   के  भगवान हे।
बंदौं  गुरु  के पद  कमल ,काटे जे सब भव प्रबल।।

गुरुवर   तोर   अराधना , मोरे   जीवन     साधना।
करहु कृपा मुझ दीन पर,सकल कला गुणहीन पर।।

डरबे झन तैं हार ले , बुरा समय व्यवहार ले।
बाद हार  के जीत हे , इही  जगत के रीत हे।।

सबर करौ होके मगन , घुरुवा मा बनथे भवन।
बाद  हार  के जीत  हे ,इही  जगत  के  रीत हे।।

सपना  मा  गाँधी  बबा , गुस्सा  ला  मन मा दबा।
आइस  मोरे   पास  मा , राम  राज  के  आस मा।।

सपना  ला सिरतोन कस , करही पूरा कोन जस।
मन मा मैं रहिथो गुनत , मुखिया के भाखा सुनत।।

नेता  भुलगे  निज धरम , करत हवय गंदा करम।
परथे  डाँका  लाज मा , अब  का होही  राज मा।।

सुग्घर सपना ठान लो , हाथ धनुष अउ बान लो।
कमर  बाँध  लो  हे सखा , बैरी  ला  धुर्रा  चखा।।

आलस जब करबे नहीं , सपना तब होही सहीं।
अपन  ठिंहा पहिचान  ले , पाये बर तैं  ठान ले।।

सीमा मा सैनिक डटे , अउ किसान हा खेत मा।
रक्षक  दूनों  देश  के , बसा  रखव   ये  चेत मा।।

कठिन परिश्रम संग मा , रखव  बात  के ध्यान।
मिलय नहीं बिन साधना , कला कुशलता ज्ञान।।

जउन जगह हाँसत दिखय , जम्मो बड़े सियान।
तउन  जगह  ला जान लौ , सुग्घर सरग समान।।

जइसे प्रकृति बसंत ले , पाये  मान   सहर्ष।
वइसे संस्कृति संत ले , पाथे शुभ   उत्कर्ष॥

हितवा नारी कस नहीं, जग मा कोनो आन।
दू ठन कुल के जी रखय, वोहा सुग्घर मान।

नारी  के शुभ कोख ले , जनम  धरे  नर देव।
करय   सृष्टि  श्रृंगार  ला , नाँव  मान से लेव॥

कर निज भाषा ले मया , बोले बर झन लाज।
महतारी   भाषा   हमर , बन  जाही सरताज॥

मीठा बानी ला समझ , सबले बढ़िया मंत्र।
बैरी  ला  हितवा  करे , अइसन  हे ये यंत्र।।

पढ़बो लिखबो सब तभे , बनही   बिगड़े  काज।
शिक्षा  के  बढ़वार  ले , आही  गउकि    सुराज॥

विरेन्द्र कुमार साहू

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