अरुण निगम गुरुदेव के , हौं मैं शिष्य नदान।
छंद काव्य के कवि बनौं , सपना मोर महान।।
साहू लक्ष्मण दाउ के , अँव मैंहा संतान।
दाई नाव भुनेश्वरी , सउहँत शक्ति समान॥
२.
निच्चट अड़हा मैं हवौं , हौं हासी के केंद्र।
रहिथौं राजिम क्षेत्र मा , हावय नाव विरेंद्र॥
३.
तेल पेरना आय जी , हम तेली सो काम।
जाँगर कनिहा तोड़ के , लेथन वाजिब दाम॥
४.
सेवा हे संस्कार बर , देथौं शिक्षा ज्ञान।
शिक्षक कवि के रूप मा,हवय मोर पहिचान॥
५.
करिया हाबे तन भले , मन के हावौं साफ।
गलती यदि कुछ हो जही,करहू मोला माफ॥
आत्मा के सौंदर्य का , शब्द रूप है काव्य।
मानव होना भाग्य है , कवि होना सौभाग्य।।
ददा नीम के पेड़ जस , कड़वा जड़ फल पान।
देवय शीतल छाँव अउ , दवा रोग बर जान॥
ददा रहे ले सब रहे , होवय पूरा शौंक।
हो कतनो गलती तभो, कुकुर सकय नइ भौंक॥
ददा बनो दशरथ सरिस , सुत बर स्वारथ त्याग।
तुमन अपन संतान बर , छोड़व दारू भाँग॥
ददा - कृपा ले सब मिले , केरा आमा सेव।
इनकर जीयत ले अपन , शौक पूर्ण कर लेव॥
सुत अमीर बनगे भले , पर पैसा बर रोय।
ददा गरीब कमाय जब ,शौक पूर्ण तब होय॥
सुखी ददा दाई रखय , जब बेटा निज पास।
देवय तब ही देवता , धन वैभव पद खास॥
दाई ददा ल मानबो , जब देवी भगवान।
तभे यकीनन बन जही , हर घर सरग समान॥
गुरु सिरतोन महान हे , धरती के भगवान हे।
बंदौं गुरु के पद कमल ,काटे जे सब भव प्रबल।।
गुरुवर तोर अराधना , मोरे जीवन साधना।
करहु कृपा मुझ दीन पर,सकल कला गुणहीन पर।।
डरबे झन तैं हार ले , बुरा समय व्यवहार ले।
बाद हार के जीत हे , इही जगत के रीत हे।।
सबर करौ होके मगन , घुरुवा मा बनथे भवन।
बाद हार के जीत हे ,इही जगत के रीत हे।।
सपना मा गाँधी बबा , गुस्सा ला मन मा दबा।
आइस मोरे पास मा , राम राज के आस मा।।
सपना ला सिरतोन कस , करही पूरा कोन जस।
मन मा मैं रहिथो गुनत , मुखिया के भाखा सुनत।।
नेता भुलगे निज धरम , करत हवय गंदा करम।
परथे डाँका लाज मा , अब का होही राज मा।।
सुग्घर सपना ठान लो , हाथ धनुष अउ बान लो।
कमर बाँध लो हे सखा , बैरी ला धुर्रा चखा।।
आलस जब करबे नहीं , सपना तब होही सहीं।
अपन ठिंहा पहिचान ले , पाये बर तैं ठान ले।।
सीमा मा सैनिक डटे , अउ किसान हा खेत मा।
रक्षक दूनों देश के , बसा रखव ये चेत मा।।
कठिन परिश्रम संग मा , रखव बात के ध्यान।
मिलय नहीं बिन साधना , कला कुशलता ज्ञान।।
जउन जगह हाँसत दिखय , जम्मो बड़े सियान।
तउन जगह ला जान लौ , सुग्घर सरग समान।।
जइसे प्रकृति बसंत ले , पाये मान सहर्ष।
वइसे संस्कृति संत ले , पाथे शुभ उत्कर्ष॥
हितवा नारी कस नहीं, जग मा कोनो आन।
दू ठन कुल के जी रखय, वोहा सुग्घर मान।
नारी के शुभ कोख ले , जनम धरे नर देव।
करय सृष्टि श्रृंगार ला , नाँव मान से लेव॥
कर निज भाषा ले मया , बोले बर झन लाज।
महतारी भाषा हमर , बन जाही सरताज॥
मीठा बानी ला समझ , सबले बढ़िया मंत्र।
बैरी ला हितवा करे , अइसन हे ये यंत्र।।
पढ़बो लिखबो सब तभे , बनही बिगड़े काज।
शिक्षा के बढ़वार ले , आही गउकि सुराज॥
विरेन्द्र कुमार साहू
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