तन हा रइही चंगा! तभे लान सकबे गंगा।।
"योग करौ" "सरसी - छंद"
उठके बिहना योग करव जी ,
मिटही कष्ट अपार।
तन अउ मन हर चंगा रइही ,
धमके नहीं अजार।।
आनी - बानी योगा आसन ,
करहू प्राणायाम।
अबड़ लाभ देवैया येहर ,
सुख के आवै धाम।।
जिनगी हाँसत पोहाना हे ,
रोजे कर तँय योग।
तन-मन-धन ले मंडल रहिके,
सुख जीवन के भोग।।
खाय करौ सादा भोजन अउ ,
करे करौ जी योग।
नइ झपाय जी कभू बिमारी ,
तन हर रही निरोग।।
योग ल सुग्घर जिनगी खातिर ,
जानौ सरल उपाय।
अपनावौ जम्मोंझन येला ,
बिना समय पोहाय।।
सबले सुग्घर धन कलयुग मा,
काया स्वस्थ्य निरोग।
करौ येल सन्जोए बर जी ,
बिहना बेरा योग।।
योग कहूं दिनचर्या बनगे ,
बदल जही तकदीर।
साधक ला सब साधन मिलही,
कहत हवय कवि वीर।।
पालन करिहौ अन्तर्मन ले ,
सुग्घर . योग विधान।
बने रही जी हाँसत-खेलत ,
जिनगी हर गतिमान।।
धरती के रक्षा जस करथे ,
वैदिक यज्ञ विधान।
जानौ तस तन रक्षा खातिर ,
योग ल यज्ञ महान।।
नियम सहित जब करिहौ योगा,
आही कला म धार।
मिलही रोजी - रोटी तुमला ,
सँग मा मान अपार।।
छंदकार :-
विरेन्द्र कुमार साहू
ग्राम - बोडराबांधा (पाण्डुका)
वि.स. - राजिम जिला -गरियाबंद
छत्तीसगढ़ , मो. 9993690899
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